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यमुना तट पर खड़े भगवान कृष्ण और उनके सम्मुख नतमस्तक भक्त का भावपूर्ण दृश्य, जो भक्ति और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है.

कान्हा, मुझे मीरा ही बना लेना

यह कविता कृष्ण-प्रेम की परंपरा में समर्पण, भक्ति और निस्वार्थ प्रेम की एक अंतर्यात्रा है. इसमें राधा और मीरा के प्रतीकों के माध्यम से आत्मा का ईश्वर से संवाद रचा गया है. प्रेम यहाँ भय से परे, सामाजिक रिवाजों से टकराता हुआ भी अडिग रहता है. जब प्रेम का अधिकार न मिले, तब दर्शन, और अंततः स्वयं को बाँसुरी बना देने की चाह यह रचना उसी परम समर्पण की अभिव्यक्ति है.

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बारिश के बाद बालकनी में खड़ी एक भावुक महिला आसमान में इंद्रधनुष देख रही है, यादों और अधूरे प्रेम का संवेदनशील दृश्य।

उम्र के गणित

उम्र के गणित” एक संवेदनशील हिंदी कहानी है, जो प्रेम, उम्र और सामाजिक सोच के बीच चलने वाले संघर्ष को दर्शाती है। कहानी में एक युवक अपने सच्चे प्रेम का इज़हार करता है, लेकिन उम्र के अंतर के कारण उसे स्वीकार नहीं किया जाता। समय बीतने के बाद एहसास होता है कि प्रेम उम्र का नहीं, भावनाओं और समझदारी का विषय है। संवादों और भावनात्मक घटनाओं से सजी यह कहानी पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि कई बार हम समाज के गणित में दिल की सच्चाई खो देते हैं।

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महिदपुर रोड में गुरु सप्तमी महापर्व की रहेगी धूम

महिदपुर रोड स्थित श्री स्थानीय सुविधिनाथ जैन मंदिर में गुरु सप्तमी महापर्व के अवसर पर प्रभात फेरी, भक्तांबर पाठ, गुरु इक्कीसा, गुरुपद महापूजन, महाआरती एवं भक्ति संध्या सहित विविध धार्मिक आयोजनों का भव्य आयोजन किया जाएगा। इसमें महिला मंडल, बहु मंडल की सक्रिय सहभागिता रहेगी।

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बालकनी से दिल तक…

शादी के 25 वर्ष बीत गए समय कैसे गुजरा पता ही नहीं चला । अपने परिवार की मर्जी के विरुद्ध किसी लड़के का हाथ थाम कर अपने जीवन सफर पर निकल जाना मेरे लिए कांटों से भरा रास्ता था , पर चुनाव मेरा था और कांटे मिले या फूल यह मेरी किस्मत. समय बदला उनकी ना धीरे-धीरे हां में बदलने लगी

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मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

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सिंगल मदर अपनी बेटी को पढ़ाते हुए, संघर्ष और प्यार का भावुक दृश्य

माँ की तपस्या, बेटी की उड़ान

“एक माँ ने अपने सारे सपनों को चुपचाप समेटकर अपनी बेटी के भविष्य के नीचे रख दिया. कभी उसने खुद को डॉक्टर के रूप में देखा था, लेकिन हालात ने उसे उस मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उसे अपने अरमानों से ज्यादा अपनी बेटी के सपनों को चुनना पड़ा. उसने बिना किसी सहारे, बिना किसी शिकायत के हर मुश्किल को अपनाया और हर दिन सिर्फ एक ही लक्ष्य के साथ जीती रही अपनी बेटी को उड़ान देना.

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मैंने समंदर देखा

गोधूलि बेला में सुनहरी रश्मियों से जगमगाता समंदर, हवा और लहरों के खेल के बीच दो प्रेमियों की पहली निकटता की कहानी। लेखक ने समंदर, लहरों और हवा की प्राकृतिक सुंदरता के साथ पात्रों की नज़रों, झुमके और बेली के गजरे के माध्यम से रोमांच और रोमांस को जीवंत किया है। हर विवरण में वातावरण और संवेदनाएँ इतनी वास्तविक लगती हैं कि पाठक खुद उस समंदर किनारे मौजूद होने का अनुभव करता है। यह कहानी प्रकृति और प्रेम के बीच की नाजुक संतुलन और पहले स्पर्श की ऊष्मा को उजागर करती है।

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उखड़ने के बाद भी ना हारा… देखिए इस पीपल की जिद!

जड़ों से उखाड़े जाने के बाद भी मुस्कुराना कैसे संभव है, यह सांवेर रोड की पहाड़ी पर लगाए गए पीपल के तने से सीखा जा सकता है। बिना शाखाओं के रहकर भी उसने हरियाली का संदेश दिया है। नगर निगम की यह पहल न सिर्फ पर्यावरण बचाने की मिसाल है, बल्कि पेड़ ट्रांसप्लांटेशन की एक प्रेरणादायक कहानी भी है।

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मिथिला समाज संस्था ने मनाया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मिथिला समाज संस्था, पुणे ने वाघोली के सांग्रिला होटल में ‘गो ग्रीन’ थीम के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया. कार्यक्रम में महिलाओं और अतिथियों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए पौधे भेंट किए गए.

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उससे मिलना

बहुत समय बाद उससे मिलकर मन को एक अजीब सुकून मिला। मैं उसे याद करता था जब वह बहुत छोटी थी — बिल्कुल गुड़िया जैसी। अब वह शादी-शुदा है, पति और बच्चे हैं, और एक खुशहाल जीवन जी रही है। यह देखकर मेरे चेहरे पर स्वाभाविक हँसी खिल उठी।

इतनी सम्पन्नता के बावजूद उसकी फितरत नहीं बदली है। उसकी सम्मोहक और उन्मुक्त हँसी, अविश्वसनीय सरलता और निहायत शालीनता आज भी बरकरार है। मैं सोचता हूँ कि कैसे वह उन मर्यादाविहीन लोगों से निपटती होगी, जो हमारे बीच निशंक घूमते हैं। ऐसे लोग अपने बीच होने पर यह भरोसा दिलाते हैं कि दुनिया आज भी सुन्दर है। उनकी मौजूदगी यह अहसास कराती है कि अच्छाई और बुराई की सतत लड़ाई में अंततः कौन जीतेगा, यह सुनिश्चित है।

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