मोती जैसे महुआ

भोर की नर्म रोशनी में पेड़ों से टपकते महुआ के फूल, मानो धरती पर बिखरते मोती हों — यही है इस कविता का मूल दृश्य। “मोती जैसे महुआ” में बाल-सुलभ जिज्ञासा और प्रकृति की सादगी का संगम है। दादी की डलिया, महुआ की सोंधी ख़ुशबू और उस क्षण की नीरवता — सब मिलकर एक ऐसे ग्रामीण सौंदर्य को रचते हैं, जहाँ हर फूल जीवन की मिठास और श्रम की सुगंध से भरा है।

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“किताब”

किताबें सचमुच खुशनसीब होती हैं। हर कोई उन्हें खोलकर पढ़ना चाहता है, उनकी गहराइयों तक उतर जाना चाहता है। मगर हम… हम तो अपनी ज़िंदगी यूँ ही किताबों से बातें करते हुए गुज़ार देते हैं। पता नहीं, हमारी अपनी गहराइयों को समझने वाला कौन होगा…और कब आएगा…जो हमें भी किसी किताब की तरह ध्यान से पढ़ सके, और हमारी ख़ामोश निगाहों में छिपे अर्थों को समझ पाए।

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अर्तम काव्य संग्रह की पुस्तक के साथ शिव और कमल का प्रतीकात्मक चित्र

‘अर्तम’ काव्य संग्रह समीक्षा: दिव्या सक्सेना की संवेदनशील कविताएं

मकालीन हिंदी कविता के बदलते परिदृश्य में दिव्या सक्सेना का काव्य संग्रह ‘अर्तम’ एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है। यह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि जीवन, संवेदना और आध्यात्मिक चेतना की गहरी पड़ताल है।

आज के दौर में जहां कविता अक्सर सपाट बयानी और अतुकांत शैली तक सीमित होती जा रही है, वहीं ‘अर्तम’ अपनी प्रतीकात्मकता, भाव-गहनता और सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण अलग पहचान बनाता है। इस संग्रह में शिवत्व, आत्मबोध, स्त्री-चेतना और जीवन संघर्ष जैसे विषयों को सहज लेकिन प्रभावी भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

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जब उम्र अपने रंग दिखाती है

चालीस और पचास के बीच की उम्र न तो पूरी तरह जवान रहने देती है और न ही वृद्ध होने की अनुमति। सफेद बाल, मेकअप पर आत्म-हास्य, हील सैंडल में असुविधा और फिल्मों में रुचि की कमी—ये सब संकेत हैं उस उम्र की जटिलताओं और बदलाव की। यह मध्यम आयु में आत्मनिरीक्षण, अनुभव और जीवन की बदलती धाराओं का एक मार्मिक अनुभव है।

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असली दीवाली: दिखावे नहीं, परिवार की खुशहाली में

डाॅ उर्मिला सिन्हा प्रसिद्ध साहित्यकार, रांची (झारखंड) दीवाली का त्यौहार आ पहुंचा।गौरी साफ-सफाई, रंग-रोगन, पूजा की तैयारी… बेटे की प्रतियोगी परीक्षा, बिटिया का फाइनल एग्जाम… बूढ़े सास-ससुर की देखभाल… पति के नखरे अलग… क्या करे, क्या छोड़ दे।सीमित आमदनी, खर्चे हजार… नाते-रिश्तेदारों का स्वागत-सत्कार। एक आम मध्यमवर्गीय, संवेदनशील परिवार की यही कहानी।खैर, काम निबटते गए……

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सोच

सोच ही हमें भीड़ से अलग करती है। दौलत नहीं, असली संपत्ति हमारी सोच है जो जीना सिखाती है, दोस्त मिलाती है, और इंसान को महान बनाती है।

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अलग-अलग आकाशों के नीचे खड़े दो व्यक्ति, दूरी के बावजूद गहरे आत्मिक जुड़ाव को दर्शाता भावनात्मक दृश्य।

अनाम बंधन

‘अनाम बंधन’ ऐसी कविता है जहाँ प्रेम आग्रह नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म अनुभूति बनकर उपस्थित होता है। दूरी, मौन और आत्मिक संबंध के बीच यह रचना अनकहे भावों की गहराई को छूती है।

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अकेले हैं, तो क्या ग़म है…

अकेलापन अंत नहीं, एक नया आरंभ है। यह वह समय है जब आप खुद को, अपनी रुचियों को और अपने जीवन के अनुभवों को नए सिरे से जी सकते हैं।अकेले होने का अर्थ यह नहीं कि आप असहाय हैं, बल्कि इसका अर्थ है कि अब आपके पास स्वयं को समझने और जीवन को अपने तरीके से जीने का अवसर है।

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“बृज की रज, रबड़ी और राधा

गोवर्धन की परिक्रमा कोई साधारण यात्रा नहीं, यह आत्मा की तपस्या है। 27 से 30 सितंबर तक की इस दंडवती परिक्रमा में मैंने न केवल शरीर को बल्कि हृदय को भी बृजरज में लोटते पाया। हर कदम, हर प्रणाम में बृज का माधुर्य, भक्ति की ऊष्मा और सेवा का भाव समाया था। भक्तों का प्रेम, रास्ते के भंडारे, बुजुर्गों की प्रेरणा और मित्र का साथ — सबने मिलकर यह यात्रा एक दिव्य अनुभव बना दी। राधा कुंड में स्नान से लेकर कुसुम सरोवर की विद्युत छटा तक, हर पड़ाव ने मुझे भीतर तक छू लिया। यह यात्रा थी—तन की थकान को तज कर मन की शांति पाने की।

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स्वयंसिद्धा

ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठी मैं अपने भीतर के तूफ़ानों को सुन रही थी। एक युवक आया और बोला. “कितनी भव्य है ये नदी।” मैंने कहा “हाँ, पर इसे बहने के लिए गिरना, टूटना पड़ा है। इसी टूटने में इसकी पहचान है।”

मैंने अपने हाथों को देखा — हर झुर्री जैसे किसी मोड़ का निशान। बोली — “हर औरत के हिस्से में भी एक नदी होती है, जो बहती है, कभी बाढ़ बनती है, कभी शांत, लेकिन अंत में अपने सागर तक पहुँच जाती है।” वो चुप रहा, बस मुझे ऐसे देखा जैसे कोई नदी को देखता है। अब वो मुझसे अपने उत्तर खोजता है, और मैं मुस्कुरा देती हूँ क्योंकि जवाब किताबों में नहीं, नदियों में बहते हैं। मैं स्वयंसिद्धा हूँ. अपने भीतर के ब्रह्मपुत्र को स्वीकार कर चुकी हूँ। अब मुझे कहीं पहुँचना नहीं, बस बहते रहना है।

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