
डाॅ उर्मिला सिन्हा प्रसिद्ध साहित्यकार, रांची (झारखंड)
दीवाली का त्यौहार आ पहुंचा।गौरी साफ-सफाई, रंग-रोगन, पूजा की तैयारी… बेटे की प्रतियोगी परीक्षा, बिटिया का फाइनल एग्जाम… बूढ़े सास-ससुर की देखभाल… पति के नखरे अलग… क्या करे, क्या छोड़ दे।सीमित आमदनी, खर्चे हजार… नाते-रिश्तेदारों का स्वागत-सत्कार। एक आम मध्यमवर्गीय, संवेदनशील परिवार की यही कहानी।खैर, काम निबटते गए… सब व्यवस्था भी करीब-करीब मनलायक ही हुई। गौरी की पड़ोसन उससे ईर्ष्या करती थी… कैसे उसके घर में सुख-शांति है, यह खटकता है।लक्ष्मी पूजन, दीपोत्सव के बाद, पड़ोसन कीमती भारी साड़ी और जड़ाऊ जेवर पहनकर, मिठाई का डिब्बा लिए आ धमकी: “लीजिए, मां जी, मुँह मीठा कीजिए।”गौरी के सासुमां के हाथ में मिठाई पकड़ा दी और फिर गौरी से हिकारत से बोली, “यह क्या साधारण साड़ी पहन रखी है, कुछ जेवर-गहने चढ़ा लेती!”
गौरी कुछ बोले कि उससे पहले सासुमां ने जवाब दिया,
“यह दीयों का त्यौहार है… किसी के पहनावे पर टीका-टिप्पणी करने के लिए नहीं। मेरी बहू गौरी के गहने, कीमती कपड़े, उसके बच्चे और उसका परिवार हैं, जिनकी खुशहाली के लिए वह दीपों के समान प्रज्वलित होती है। जिसकी ज्योत में उसका घर-परिवार जगमगाता रहता है। वह झूठा दिखावा नहीं करती… पति से झगड़ा नहीं करती गहनों और कपड़ों के लिए… बल्कि बच्चों को परिश्रम का रास्ता सिखाती है।”
पड़ोसन का मुँह लटक गया क्योंकि उसके कलह और अनुचित मांगों के कारण, दीवाली के दिन भी पति अवैध कमाई में लगे थे और घर नहीं आए।दोनों बच्चे भी मां की उदासीनता से अवारा दोस्तों के चक्कर में अपनी बर्बादी के कगार पर खड़े थे।
सासुमां की बातों से पड़ोसन को झटका सा लगा… ठीक ही तो कह रही हैं।अपने सामने गौरी का साधारण रूप लक्ष्मी स्वरूपा दमकता दिखाई दिया। पड़ोसन की आंखें खुल गईं… पति का स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य से बढ़कर कुछ नहीं।
असली दीवाली पारिवारिक उन्नति में है, न कि दिखावे में।

बिल्कुल सही। झूठे आडंबर में हमारे सभी त्योहारो की चमक फीकी पड़ती जा रही है।
एकदम सही बात बताई, आपने कहानी के माध्यम से ।