अकेले हैं, तो क्या ग़म है…


वृद्धावस्था में अकेलेपन को अपनी ताकत बनाइए

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

    अकेले हैं, तो क्या ग़म है? यह गीत भले ही जवानी के दिनों के लिए लिखा गया हो, लेकिन आज के समय में इसका असली अर्थ वृद्धावस्था की ओर बढ़ते लोगों के जीवन से अधिक जुड़ता हुआ प्रतीत होता है.
    आज का सामाजिक परिवेश तेजी से बदल रहा है. छोटे शहरों के बच्चे पढ़ाई और नौकरी के लिए बड़े शहरों की ओर जा रहे हैं, वहीं महानगरों के बच्चे विदेशों में बस रहे हैं. परिणामस्वरूप, माता-पिता अक्सर अपने घरों में अकेले रह जाते हैं. ढलती उम्र में नया देश, नई भाषा, नया रहन-सहन और नए लोगों के बीच जीवन बिताना आसान नहीं होता. कुछ ही बैगों में अपना संसार समेटकर कहीं और बस जाना किसी के लिए भी सहज नहीं होता.
    अकेलेपन से डरें नहीं, उसे अपनाएं
    यदि आपके बच्चे आपके पास नहीं हैं, तो घबराने की ज़रूरत नहीं है. अकेलेपन से घबराने के बजाय उसे अपनी ताकत बनाइए. इसके लिए आवश्यक है कि हम इसकी तैयारी पहले से करें.अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें. नियमित रूप से सुबह की सैर करें, व्यायाम करें और एक अच्छा ग्रुप बनाएं. दिन की शुरुआत अगर ऊर्जा से भरी होगी, तो दिनभर मन प्रसन्न रहेगा.
    तकनीक से दोस्ती करें
    अक्सर उम्रदराज लोग तकनीक से डरते हैं, लेकिन अब यह डर छोड़ने का समय है. मोबाइल, इंटरनेट और ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल सीखें. इससे न केवल आपकी रोजमर्रा की ज़िंदगी आसान होगी, बल्कि दूसरों पर आपकी निर्भरता भी कम होगी.
    सामाजिक मेलजोल बनाए रखें
    अपने आसपास के लोगों से जुड़ाव बनाए रखना मानसिक सेहत के लिए अत्यंत आवश्यक है. पड़ोसी, दोस्त या सोसाइटी के लोगों के साथ समय बिताएं. कभी फिल्म देखने जाएं, कभी साथ में ताश या कैरम खेलें, संगीत की महफिल सजाएं भले ही आप गाना जानते हों या नहीं. जीवन में किसी भी उम्र में सीखने की प्रक्रिया रुकनी नहीं चाहिए. पढ़ने की आदत डालिए किताबें हमारे सबसे सच्चे दोस्त होती हैं. वे न केवल ज्ञान देती हैं, बल्कि अकेलेपन में एक सुकूनभरा साथ भी देती हैं.
    समाज के साथ सक्रिय रहें
    अकेलापन केवल मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि एक चुनौती भी है जिसे समाजिक भागीदारी से कम किया जा सकता है.
    पास-पड़ोस के लोगों से संवाद बनाए रखें ताकि आवश्यकता पड़ने पर कोई मदद के लिए आगे आ सके. जैसे एक उदाहरण में, एक बुजुर्ग दंपति ने अपने पड़ोसी के बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारी ली, जिससे न केवल बच्चे को दादा-दादी जैसा स्नेह मिला बल्कि बुजुर्गों का समय भी सुकून से बीता. यह उदाहरण दिखाता है कि आपसी सहयोग दोनों पीढ़ियों के लिए लाभदायक होता है.
    सोशल मीडिया या व्हाट्सएप जैसे माध्यमों से जुड़े रहना आज की ज़रूरत है. इससे आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों की खबर रख सकते हैं. अगर कोई लंबे समय तक जवाब नहीं देता, तो आप उनकी खैरियत जान सकते हैं यह एक सरल परंतु सशक्त तरीका है जुड़ाव बनाए रखने का.
    दूसरा साथ एक नई शुरुआत
    अगर 60 या 65 की उम्र में जीवनसाथी का साथ छूट जाए, तो अकेले सफर तय करना कठिन हो सकता है. ऐसे में यदि कोई व्यक्ति आपकी परिस्थितियों को समझते हुए आपके साथ रहना चाहता है, तो बच्चों से बात करके समझदारी से निर्णय लेना चाहिए.
    समाज के डर से अपनी भावनाओं को दबाना उचित नहीं. सुख और संग दोनों उम्र के किसी पड़ाव में वर्जित नहीं हैं.अकेलापन अंत नहीं, एक नया आरंभ है. यह वह समय है जब आप खुद को, अपनी रुचियों को और अपने जीवन के अनुभवों को नए सिरे से जी सकते हैं. अकेले होने का अर्थ यह नहीं कि आप असहाय हैं बल्कि इसका अर्थ है कि अब आपके पास स्वयं को समझने और जीवन को अपने तरीके से जीने का अवसर है.

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