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जब उम्र अपने रंग दिखाती है

ज्योति सोनी, प्रसिद्ध लेखिका, अलवर

उम्र उस मोड़ पर है,
जहाँ सफेद बाल धीरे-धीरे झांकने लगते हैं।
दो-चार दिन की डाई के बाद भी
मानो कह रहे हों—
“क्या छुपाना चाहते हो, उम्र?”

उस मोड़ पर आ गई है कि जब कोई कह देता है,
“आंटी जी, नमस्ते,”
तो भीतर एक धक्का सा लगता है—
“क्या मैं सच में प्रौढ़ हो गई हूँ?”

जरा ज्यादा मेकअप करूँ तो
मेरी आत्मा हँस पड़ती है—
“बस करो, अब और नहीं!”

हील की सैंडल अब चिढ़ाती हैं,
पहले की तरह बुलाती नहीं।
सिनेमा देखने का मन भी अब कम ही होता है।

ये उम्र है चालीस के बाद और पचास के बीच की,
न जवान रहने देती है,
और न बूढ़ा होने देती है।

यह वह मोड़ है,
जहाँ अनुभव, आत्म-सम्मान और छोटे-छोटे बदलावों की समझ
एक साथ मिलती है।

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