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रामायण गाथा : धर्म की विजय

उषा शर्मा, जामनगर (गुजरात)

दशरथ के प्राण प्रिय कौशल्या के राज दुलारे राज पाठ त्याग वन चले रघुराई हैं।
पितु आज्ञा शिरोधार्य संग सिया और भ्रात राम जी ने रघुकुल रीति निभाई है।।
स्वर्ण मृग देख सिय मांगे लालसा से जब,जानत माया प्रभु आखेट लीला रचाई है।
मायावी साधुवेश रावण हर लीनी मात, व्याकुल वन-वन खोजे पुकारे द्वौ भाई हैं।।

मिले घायल जटायू राज, हरण क्रदंन सिय चिन्ह सौंप, रावण युद्ध कथा सुनाई है।
प्राण तजे श्रीराम अंक,सियामातु रक्षा धर्मकाज,जीवन सफल मोक्ष गति पाई है।।
मिले हनुमत सुग्रीव कपिदल, सखा सहारे सब, माता जानकी की खोज लगाई है।
अंगूठी निशानी दीन्ही मात, संदेशा ले लौटे सुत, चहुंँओर सोने की लंका जराई है।।

नील नल बने सहाय, कपिदल सहित सिय लेन, सिंधु सेतु पार कर पहुँचे रघुराई हैं।
भीषण युद्ध भयो तब,वंश नाश कीने रघुनाथ,अभिमानी दशानन ने देखी प्रभुताई है।।
असुरों का समूल नाश हर्षित ऋषि देवगण आज, वंदन गुणगान करें शीष नवाई हैं।
अधर्म पर धर्म की जीत संदेश देत प्रभु, मर्यादा पुरुषोत्तम कहाये श्रीराम रघुराई हैं ।।

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