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राहें और मंज़िल

अलका ओझा, मुंबई 

लक्ष्य सभी का एक ही होता,
मगर राहें सबकी अपनी होतीं।
कोई लिफ्ट में चढ़ जाता ऊपर,
कोई सीढ़ियां गिनता-गिनता चढ़ता।

कुछ ऐसे भी होते हैं जग में,
जो पहले सीढ़ियां बनाते हैं,
फिर अपने पसीने की बूंदों से,
उन पर चलकर ऊँचाई पाते हैं।

मंज़िल सबको मिलनी है आखिर,
पर सफ़र तय करना अपना है।
रुकना नहीं, थमना नहीं कहीं,
हर क़दम पर हौसला बनना है।

जिसने राह चुनी दिल से अपनी,
उसका सूरज ज़रूर चमकता है,
जो आगे बढ़ता चलता जाता,
उसका सपना साकार होता है

7 thoughts on “राहें और मंज़िल

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