
जिज्ञासासिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ
आज भोर में चूते देखा,
कुछ मोती पेड़ों से —
चमकीले और बड़े-बड़े।
टप्प-टप्प टपकें धरती पर,
बिछ-बिछ जाएँ,
रहे देखते हम उनको खड़े-खड़े॥
बीन-बीन कर बूढ़ी दादी,
रखें भर-भर डलिया।
घूर रहा है खड़ा हुआ,
उस उपवन का मलिया॥
कितना ज़्यादा, कितना कम,
थके जा रहे बिलकुल हम।
एक टक टकटकी
लगाए तड़े-तड़े॥
सोंधी ज़रा नशीली ख़ुशबू,
महक दूर तक फैली।
देख फूल की छवि अनोखी,
जब जिज्ञासा मचली॥
मोती एक उठाया मैंने,
नर्म-मुलायम सूँघा मैंने,
मोती बनके दिखते महुआ,
आज गए पकड़े॥

अति मोहक
बहुत आभार आपका।
सुन्दर रचना
बहुत खूबसूरत वर्णन
हार्दिक आभार आपका।