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खामोश रात…

यादों के दरिए पर जब किसी खास की यादों की आहट आती है, तो रात खामोश होकर भी गहराई से बोलती है। “खामोश_रात” में मन की बेचैनी, अंतहीन यात्रा और इंतजार की भावनाएँ बुनकर एक शांत, संवेदनशील दृश्य रचा गया है, जहाँ रात की चुप्पी भी अपने आप में एक कहानी कहती है।

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वो पल…

सपना चन्द्रा , कहलगांव, भागलपुर (बिहार) कुछ तो था उस पल में —चाँद, कबूतर, सफेद बादल,लालिमा ओढ़े उगता सूरज,और टिप-टिप बरसतीबूँदों की रिमझिम बरसात,इंद्रधनुष की सतरंगी पट्टी। जाने कब इन आँखों में कैद हुईचलती-फिरती हरेक तस्वीर,चाहा उतार लूँ कागज परएक सुंदर सी तस्वीर,उस छोर को याद करते हुएजिससे मैं बंधी थी,मगर उलझी हुई सी। पर…

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मोती जैसे महुआ

भोर की नर्म रोशनी में पेड़ों से टपकते महुआ के फूल, मानो धरती पर बिखरते मोती हों — यही है इस कविता का मूल दृश्य। “मोती जैसे महुआ” में बाल-सुलभ जिज्ञासा और प्रकृति की सादगी का संगम है। दादी की डलिया, महुआ की सोंधी ख़ुशबू और उस क्षण की नीरवता — सब मिलकर एक ऐसे ग्रामीण सौंदर्य को रचते हैं, जहाँ हर फूल जीवन की मिठास और श्रम की सुगंध से भरा है।

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