मोती जैसे महुआ
भोर की नर्म रोशनी में पेड़ों से टपकते महुआ के फूल, मानो धरती पर बिखरते मोती हों — यही है इस कविता का मूल दृश्य। “मोती जैसे महुआ” में बाल-सुलभ जिज्ञासा और प्रकृति की सादगी का संगम है। दादी की डलिया, महुआ की सोंधी ख़ुशबू और उस क्षण की नीरवता — सब मिलकर एक ऐसे ग्रामीण सौंदर्य को रचते हैं, जहाँ हर फूल जीवन की मिठास और श्रम की सुगंध से भरा है।
