माँ जैसी नहीं हूं मैं…
यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।
वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।
सिंहस्थ 2028 में बदलेगा ट्रैफिक मॉडल
सिंहस्थ 2028 को लेकर प्रशासन ने इस बार ट्रैफिक प्रबंधन का पूरा खाका बदल दिया है। करीब 30 करोड़ श्रद्धालुओं के संभावित आगमन को देखते हुए शहर के बाहर मल्टीलेवल पार्किंग विकसित की जाएगी, जहां से विशेष बसों के जरिए श्रद्धालुओं को मेला क्षेत्र तक पहुंचाया जाएगा। यह व्यवस्था पहली बार “पार्किंग टू पिलग्रिम ट्रांसपोर्ट” मॉडल के तहत लागू होगी, जिससे शहर के भीतर वाहनों की भीड़ को नियंत्रित किया जा सके।
दो चेहरे
आज का समाज दो चेहरों में जी रहा है एक वह जो भीतर सचमुच है और दूसरा वह जो बाहर दुनिया को दिखाया जाता है। खुशियाँ अब साझा कम और तुलना ज़्यादा बन गई हैं, जहाँ किसी की तरक्की दूसरे के भीतर जलन जगा देती है। झूठे वादों और बनावटी शान-ओ-शौकत के शोर के बीच बचपन चुपचाप वही सीख रहा है जो हम जी रहे हैं। अगर समय रहते हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ी को सच्चाई नहीं, बल्कि सिर्फ़ दिखावे से भरी एक चमकदार लेकिन खोखली दुनिया विरासत में मिलेगी।
पट समय के खोलने दो
कविता की हर पंक्ति भीतर से निकलती हुई आत्मा की पुकार थी। उसने खुद को दीप की तरह जलने दिया, ताकि उसकी रौशनी चारों ओर फैले। कैद की दीवारें अब उसे रोक नहीं सकती थीं; हँसने, बहने और खुलकर जीने का समय आ गया था।
भीतर की नदी को जब उसने खोल दिया, तो उसके किनारे टूट गए और जहाँ भी पड़ी, जीवन भीग गया। भूले हुए राग अब ताल में लौट आए, खलिश की पुरानी यादें गीत बनकर बह गईं। जीवन के फीके रंग अब नए सपनों के रंग में घुलने लगे। हवाओं की घुटन और रात की निशा भी खुल गई; समय के पट अब खुल चुके थे।
यह कविता एक स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की कहानी थी—जहाँ भीतर की ऊर्जा और रचनात्मकता खुलकर बहती है, और आत्मा को अपनी पूरी क्षमता के साथ जीने का अवसर मिलता है।
फूलों की माला, हवा का राग”
“हर्षित धरा, हर्षित अंबर, कोहरे की विदाई, भौंरे और तितलियों की मुस्कान। दहकते पलाश, हरे-हरे परिधान, पीली सरसों की सजती दुकान। गेहूँ और चने की झूमती बाली, कोयल की मतवाली कूक। अमलतास की झूलती डालियाँ, फूलों की माला लिए प्रीत खड़ी है द्वार पर—सारी धरती बसंत से प्यार में डूबी हुई।”
विजया निमला: ज़िंदगी की हर दौड़ में विजेता
57 वर्षीय विजया निमला के लिए रनिंग सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ज़िंदगी का रूपक है। स्लिप डिस्क, फ्रैक्चर और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी शारीरिक चुनौतियों को उन्होंने कभी अपनी मंज़िल के बीच नहीं आने दिया। फैशन डिज़ाइनिंग, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, समाजसेवा और फिटनेस — इन सभी को सहजता से संतुलित करते हुए उन्होंने यह साबित किया है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है। अपने पति राजेंद्र निमला और फिटनेस-प्रेमी बच्चों के साथ उन्होंने जीवन की हर दौड़ में जीत हासिल की है और हर फिनिश लाइन को एक नई शुरुआत में बदल दिया है।
तीर्थ : आत्मा की यात्रा
तीर्थ केवल स्थान नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। जब जीवन की भागदौड़ में मन थक जाता है, तीर्थ हमें भीतर की शांति और ईश्वर के सान्निध्य की ओर ले जाता है। भारत के चार धाम बद्रीनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी और द्वारका सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। तीर्थ यात्रा हमें अपने भीतर झाँकने, अहंकार छोड़ने और देश, संस्कृति व आत्मा से जुड़ने का अवसर देती है।
हर उम्र की वॉकिंग डोज़
लना हर उम्र के लिए फायदेमंद है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि अलग-अलग आयु वर्ग के लिए वॉकिंग का समय अलग होता है? बच्चों को 60 मिनट, युवाओं को 30–45 मिनट और वरिष्ठ नागरिकों को 20–30 मिनट की वॉक की सलाह दी जाती है। सही अवधि में नियमित वॉक हृदय स्वास्थ्य, वजन नियंत्रण और मानसिक संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।
चिड़िया प्यासी है…
यह कविता “चिड़िया प्यासी है” जल संरक्षण और जीवदया का मार्मिक संदेश देती है। बदलते पर्यावरण और घटती चिड़ियों की संख्या के बीच यह रचना हमें याद दिलाती है कि पक्षियों के लिए पानी रखना भी एक बड़ी सेवा है।
