माँ तो माँ होती है…

माँ का साथ शब्दों का मोहताज नहीं होता। कभी वह धूप में छाता बन जाती है, तो कभी जीवन की भीड़ में सहारा। उम्र भले ही शरीर पर अपना असर छोड़ दे, पर माँ की मौजूदगी वही सुकून देती है. निःशब्द, निःस्वार्थ और पूरी तरह सुरक्षित। माँ के साथ बिताया हर पल स्मृति बनकर जीवन भर साथ चलता है

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बिस्तरबंद: जब सफ़र में घर साथ चलता था

एक समय था जब हर यात्रा का सबसे भरोसेमंद साथी “बिस्तरबंद” होता था। उसमें सिर्फ बिस्तर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सहूलियत, बचपन की जिज्ञासाएँ और सफ़र की गर्माहट बंद होती थी। आज भले ही एयरबैग ने उसकी जगह ले ली हो, पर यादों में बिस्तरबंद अब भी ज़िंदा है।

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बिना स्क्रीन का बचपन

बचपन में आम की गुठलियाँ हमारी खुशियों का साधन थीं। महिदपुर रोड की गलियों में बिखरी गुठलियाँ अंकुरित होकर छोटे पौधे बन जाती थीं। हम उन्हें उखाड़कर घर लाते, पत्थर पर घिसते और फूँक मारकर सुनते “बज रहा है या नहीं।” टूटती गुठली पर डाँट और मार भी सहते, फिर अगले दिन फिर से तलाश में निकल पड़ते। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, वह सिर्फ़ खेल नहीं था. धैर्य, लगन और छोटे-छोटे प्रयासों की सीख भी थी, जो अब तक दिल में धीरे-धीरे बजती रहती है।

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काँच नहीं, अब धार हूँ

कभी किसी दिन जीवन की भाग-दौड़ से पल चुराकर मैं अपनी ही बनाई शांति में बैठूँगी। फूलों, पेड़ों और परिंदों की चहचहाहट के बीच मैं खुद को सुनूँगी और तब समझ आएगा कि सबसे बड़ा सहारा मैं स्वयं रही हूँ। टूटकर भी जिसने खुद को समेटा, वही मेरी असली पहचान है।

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रात के नौ बजे, जब किस्मत जागती थी…

रात के ठीक नौ बजते ही महिदपुर रोड की रफ्तार बदल जाती थी। दादाभाई की दुकान के आसपास भीड़ सिमटने लगती, आँखों ही आँखों में फैसले हो जाते और किस्मत अपने पत्ते खोलने को तैयार रहती। नंबर खुलते ही कोई भीतर ही भीतर टूट जाता, तो कोई ऑपरेशन थिएटर के सफल होने जैसी राहत महसूस करता। वलन मिलते ही गर्म दूध के कड़ाह चढ़ जाते, मावाबाटी और रबड़ी के ऑर्डर लगते और पुरानी उधारियाँ मिठास में घुलकर उतर जातीं।यह सिर्फ़ सट्टे का खेल नहीं था. यह एक पूरे कस्बे की रातों की धड़कन थी।

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पुरानी यादों की साउंडट्रैक: ऑडियो कैसेट का जादू

सन 1990 का दशक, जब घरों में टीवी और वीसीआर थे, और मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन कैसेटें थीं। फ़िल्में घर पर किराए पर लेकर देखी जातीं ऋषि कपूर और शाहरुख़ की दीवाना या संजय दत्त और माधुरी की साजन और फिर कैसेट लौटाई जाती। देबु की छोटी दुकान, पाकिस्तानी स्टेज प्ले की हास्य कैसेटें, ऑडियो कैसेट की अपनी आवाज़ और गली में बच्चों का टीवी देखने का मज़ाये सब उस समय की यादों का हिस्सा थे। धीरे-धीरे केबल टीवी और डिजिटल तकनीक ने कैसेट का दौर समाप्त कर दिया, लेकिन उस समय का अपनापन और इंतज़ार आज भी यादों में जीवित है।

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यह घर बहुत हसीन है

मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।

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साहित्यिक पत्रिका ‘विरासत’ के विमोचन पर भव्य समारोह

साहित्यिक पत्रिका विरासत की प्रथम वार्षिकी और नवीन अंक के विमोचन के अवसर पर मुंबई में एक भव्य साहित्यिक और सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें कविता, नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ प्रमुख साहित्यकारों और विशिष्ट अतिथियों की सहभागिता रहेगी.

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“1990 के दशक का भारतीय घर जिसमें टेपरिकार्डर, कैसेट और मटके पर रखा स्पीकर देसी जुगाड़ साउंड सिस्टम के रूप में इस्तेमाल हो रहा है”

बेबी को बेस पसंद है

स सिर्फ़ आवाज़ नहीं होता, वह एक जुनून होता है। टेपरिकार्डर, कैसेट और जुगाड़ से पैदा हुआ वह गूंजता बेस, जो साधारण मशीन को भी महफिल बना देता था। मटके पर उल्टा रखा स्पीकर सिर्फ़ प्रयोग नहीं था, वह उस दौर की रचनात्मक ज़िद थी जहाँ साधन कम थे, पर शौक़ और शरारत दोनों भरपूर थे। और हाँ, घर से थोड़ी दूर रहने वाली ‘बेबी’ को भी वही बेस पसंद था।

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अपुन की दादीगीरी

पाँचवीं से छठवीं में कदम रखते ही स्कूल मेरे लिए पढ़ाई से ज़्यादा एक अजीब अनुभव बन गया था। कक्षा में न विद्यार्थी थे, न प्रतिस्पर्धा सिर्फ़ मैं और मेरा वर्चस्व। पिता का अनुशासन, स्कूल में उनका रुतबा और मेरी अकेली उपस्थिति ने मुझे अनजाने ही “दादीगीरी” का ताज पहना दिया। यह दादीगीरी डर से नहीं, परिस्थितियों से उपजी थी. जहाँ सीखने के साथ-साथ प्रभुत्व भी अभ्यास का हिस्सा बन गया।

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