साइकिल, सपने और मिल रोड

नौवीं कक्षा में प्रवेश से पहले साइकिल सीखने का सपना हर छोटे शहर के बच्चे की तरह लेखक के मन में भी पलता रहा। पैसों की कमी, उधारी की सीमाएँ और जुगाड़ के सहारे मिली एक खटारा साइकिल गिरते-पड़ते सीखने की कोशिश और अंत में हुई “क्रैश लैंडिंग” इस कहानी को मासूम बचपन की यादों से भर देती है।

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टूटे शीशों के बीच खिलता लालबाग

स्नातकोत्तर अध्ययन के दौरान दक्षिण भारत की 21 दिनों की यात्रा लेखक के लिए केवल भ्रमण नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और मानवीय व्यवहार को समझने का गहन अनुभव बनी। बंगलौर में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक अनजान व्यक्ति की निस्वार्थ मदद और लालबाग की शांति इस यात्रा को जीवनभर स्मरणीय बना गई।

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कोई लौटा दे मेरे… वो स्कूल के दिन!

पैदल स्कूल जाना, बिना ट्यूशन के पढ़ाई, सादगी भरा जीवन और माता-पिता की निश्चिंतता। सुविधाओं की कमी के बावजूद उस दौर में संतोष, आत्मनिर्भरता और खुशियों की भरपूर अनुभूति थी, जो आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में दुर्लभ हो गई है।

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मीरा के नाम ख़त

मीरा के जीवन और भक्ति को याद करते हुए लेखिका अपने भीतर उठते असंख्य प्रश्नों से जूझती है। बिना देखे कृष्ण पर किया गया अटूट विश्वास, सांसारिक सुखों का त्याग और विषम परिस्थितियों में भी स्वयं को अक्षुण्ण रखना मीरा की भक्ति आज भी मन को विस्मित और प्रेरित करती है।

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जीत

हार को स्वीकार करने का साहस ही सच्ची जीत की शुरुआत होता है। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपना संयम और आत्मविश्वास बनाए रखता है, वही आगे चलकर मंज़िल तक पहुँचता है। रास्ते आज कठिन लग सकते हैं, पर यदि हौसलों से भरी कोशिश जारी रहे तो कल वही रास्ते सफलता की ओर ले जाते हैं। गिरना जीवन का स्वभाव है, पर हर बार गिरकर उठना और फिर आगे बढ़ना ही संघर्ष की असली पहचान है।

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वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

बचपन की यादें हमेशा खास रहती हैं। रविवार की सुबह, बारिश में कागज़ की कश्ती तैराना, दोस्तों के घर जाकर टीवी देखने की खुशी ये छोटे-छोटे पल हमारी दुनिया को पूरी तरह जीवंत बना देते थे। अब काम, ऑफिस और जिम्मेदारियों के बीच वही मासूमियत खो गई है, पर अंदर वही छोटा बच्चा अभी भी जिंदा है, बारिश में कागज़ की कश्ती बहा रहा है, और हर याद उसे मुस्कुराकर बुला रही है।

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जिंदगी भर नहीं भूलेगी मेट्रो की वो रात…

एक भागती-दौड़ती मुंबई की रात में, मैं मेट्रो के सफर पर थी, अपने बैग और गिफ्ट बॉक्स के साथ, साड़ी में शाही अंदाज़ लिए। एक अजनबी सज्जन ने बिना किसी शब्द के मेरी मदद की, मेरा सामान लौटाया और बाद में टिकट लेने में भी सहायता की। हमारी अनौपचारिक बातचीत, मुस्कानें और छोटे-छोटे इशारे उस रात को यादगार बना गए। सफर के बीच हमारी बातचीत इतनी सहज और हल्की थी कि समय का पता ही नहीं चला। उनके व्यवहार में न तो अश्लीलता थी, न कोई लालसा सिर्फ मित्रवतता और आदर।

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नीम का पेड़

एक लंबे समय बाद उसी स्टेशन पर उतरते ही यादों की महक मुझे बाँहों में भर लेती है। बचपन की गलियाँ, नीम का पेड़, उड़ती रुई और टूटी-फूटी बस सब मन के भीतर फिर से जीवित हो उठते हैं। मगर जब शहर नए नामों और मॉलों में बदल चुका होता है, तो एहसास होता है कि स्मृतियाँ जहाँ ठहरी थीं, समय वहाँ से बहुत आगे निकल गया है।

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मंज़िल मिल ही जाएगी

निरंतर प्रयास और पूरे विश्वास के साथ बढ़ते रहने से मंज़िल अवश्य मिलती है। चाहे राह में कठिनाइयाँ हों, नाव में छेद हों या अँधेरा छाया होहौसला और संकल्प टूटना नहीं चाहिए। छोटे-छोटे प्रयास, जैसे तिनकों से बना घोंसला, बड़ी बाधाओं का सामना कर लेते हैं। मेहनत ही वह चाबी है जो हर ताला खोलती है; अभ्यास से साधारण बुद्धि भी प्रखर हो जाती है। प्रेम, धैर्य और कर्म के साथ आगे बढ़ने वाला व्यक्ति अंततः अपनी मंज़िल पा ही लेता है।

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मेहनत और सफलता

मेहनत ही सफलता की सच्ची कुंजी है। चाहे चींटी का निरंतर प्रयास हो या कुम्हार, किसान, मजदूर और माता-पिता का श्रम हर जगह यही सच सामने आता है कि लगन और परिश्रम से ही जीवन को आकार मिलता है। जो लक्ष्य पर टिके रहते हैं, वही अंततः सफल होते हैं।

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