मुंबई मराठी पत्रकार संघ में आर के ओपन माइक ‘उत्सव शब्दों का’ कार्यक्रम में मंच पर प्रस्तुति देते प्रतिभागी और उपस्थित साहित्यकार

मुंबई में सजा ‘उत्सव शब्दों का’

आर के पब्लिकेशन द्वारा मुंबई मराठी पत्रकार संघ में आयोजित ‘उत्सव शब्दों का’ ओपन माइक कार्यक्रम में 50 से अधिक प्रतिभागियों ने हिंदी, मराठी, अंग्रेजी और अवधी भाषाओं में शानदार प्रस्तुतियाँ दीं। तीन सत्रों में विभाजित इस आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों और निर्णायकों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

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डायरी पर लिखी हिंदी ग़ज़ल के पन्नों पर गिरते आँसू, रात की हल्की रोशनी में भावुक माहौल

आँसुओं का हिसाब रखे ज़माना हुआ…

यह ग़ज़ल इश्क़ की तड़प, जज़्बातों के छल और सत्ता की विडंबना को एक साथ समेटती है। शमा, परवाना, कफ़न और मयखाने जैसे प्रतीकों के माध्यम से कवि ने दर्द और दौर-ए-वक़्त का सटीक चित्र खींचा है।

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मैं कहीं भी नहीं थी: स्त्री अस्तित्व और पहचान पर मार्मिक कविता

मैं कहीं भी नहीं थी…

यह कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ है जो हर जगह मौजूद होते हुए भी कहीं दर्ज नहीं थी। यह उसकी पहचान, उसकी अनसुनी चीख और उसके जीवित रहने के अधिकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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होली के रंगों में सराबोर दंपति, हवा में उड़ता गुलाल और पृष्ठभूमि में सुनहरी फागुन की रोशनी

देखो होली आई है…

यह कविता होली के रंगों में डूबी प्रेम और प्रतीक्षा की कथा कहती है। फागुन की पुरवाई, लाल-गुलाबी रंग और प्रियतम की स्मृतियाँ सब मिलकर विरह को और भी मधुर बना देते हैं। यह रचना उत्सव के बीच छुपी प्रेम की तड़प को खूबसूरती से अभिव्यक्त करती है।

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लाल टेशू के फूलों से लदे पेड़ की डाल पर बैठी एक अकेली स्त्री की परछाईं, पृष्ठभूमि में धुंधला बियाबान जंगल

उसने चाहा प्रेम…

यह कविता स्त्री की उन अधूरी इच्छाओं की कहानी कहती है जिन्हें समाज ने अपराध, पाप या विद्रोह घोषित कर दिया। प्रेम, सौंदर्य, आध्यात्म और स्वतंत्रता की चाह रखने वाली स्त्री हर मोड़ पर दंडित होती रही लेकिन अंततः वह अपनी ही आग में एक नई सत्ता बनकर उभरती है।

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मिट्टी के पात्र में रखा पानी पीती हुई प्यास से व्याकुल छोटी चिड़िया

चिड़िया प्यासी है…

यह कविता “चिड़िया प्यासी है” जल संरक्षण और जीवदया का मार्मिक संदेश देती है। बदलते पर्यावरण और घटती चिड़ियों की संख्या के बीच यह रचना हमें याद दिलाती है कि पक्षियों के लिए पानी रखना भी एक बड़ी सेवा है।

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साड़ी में खड़ी एक बहू, पीछे धुंधली पारिवारिक पृष्ठभूमि, चेहरे पर मिश्रित भावनाएँ

बेटी से बहू कब बन गई…?

यह लेख दर्शाता है कि किस तरह एक लड़की शादी के बाद बेटी से बहू बन जाती है, और कैसे समय आने पर उससे बेटी जैसा व्यवहार अपेक्षित किया जाता है। यह लेख रिश्तों में सच्चे अपनापन और समान सम्मान की आवश्यकता पर भावनात्मक प्रकाश डालता है।

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अपनी बेटी का हाथ थामे आत्मविश्वास से आगे बढ़ती माँ, नए शहर की पृष्ठभूमि में उगता सूरज

मुक्ति की उड़ान…

“मुक्ति की उड़ान” एक सशक्त कहानी है जो दर्शाती है कि जब एक माँ अपने आत्मसम्मान और बेटी के भविष्य के लिए खड़ी होती है, तो वह समाज की हर रूढ़ि को तोड़ सकती है। यह कहानी नारी साहस, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल है।

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सफेद पन्नों पर रंगीन कलम से लिखता हुआ व्यक्ति, खिड़की से आती हल्की धूप और प्रेरणादायक माहौल

लिखो…

“लिखो” एक प्रेरणादायक कविता है जो हमें अपने जज़्बात, सपनों और जीवन के अनुभवों को शब्दों में ढालने के लिए प्रेरित करती है। यह कविता बताती है कि लिखना केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मा का सुकून और इतिहास रचने की शुरुआत है।

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प्रकृति के बीच अकेली स्त्री, घास पर बैठी आसमान की ओर देखती हुई, आत्मचिंतन का शांत दृश्य

फिर कभी न लौटने के लिए…

“फिर कभी न लौटने के लिए…” एक गहन भावनात्मक और दार्शनिक कविता है, जिसमें कवयित्री तन्हाई, प्रकृति और आत्म-अन्वेषण के माध्यम से जीवन के गूढ़ प्रश्नों को समझने की कोशिश करती है। यह कविता आत्मा की शांति और अस्तित्व की खोज का संवेदनशील चित्रण है।

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