माया का जाल और आत्मा की उड़ान

जैसा कि वेद-पुराणों में वर्णित है कि चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् मनुष्य जीवन की प्राप्ति होती है। कहा गया है “जनमत मरत दुःसह दुख होई।”
प्राणी जब एक बार जन्म लेता है और मरता है, तब लाखों बिच्छुओं के डसने जैसी पीड़ा सहनी पड़ती है। बड़े सत्कर्मों के फलस्वरूप विवेकशील प्राणी मानव रूप में इस नश्वर जगत में जन्म लेता है।

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पोटली खुली नहीं, हृदय खुल गया

कथा विश्राम का वह क्षण केवल समापन नहीं था, वह कृष्ण–सुदामा की मित्रता का सजीव दर्शन बन गया। राजमहल के वैभव में अपने बालसखा को गले लगाते श्रीकृष्ण और काँपते हाथों में पोटली थामे सुदामा इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं के हृदय पिघला दिए। बिना माँगे सब कुछ पा लेने वाली सुदामा की भक्ति और निष्काम मित्रता ने पंडाल में बैठे हर व्यक्ति की आँखें नम कर दीं।

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दगडूशेठ गणपति के चरणों में झुका पुणे

नववर्ष 2026 का शुभारंभ पुणे में पूर्णतः भक्तिमय वातावरण में हुआ. वर्ष के पहले ही प्रहर में श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर आस्था का महासंगम बन गया. ‘मंगलमूर्ति मोरया, गणपति बाप्पा मोरया’ के मधुर और गूंजते जयघोष के साथ श्रद्धालुओं ने विघ्नहर्ता गणपति के चरणों में नववर्ष अर्पित किया.

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रास की कथा से जीवन होता है रसपूर्ण

स्थानीय श्री राम मंदिर हनुमान सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के छठे दिन भक्तिरस से ओतप्रोत वातावरण देखने को मिला. कथा व्यास पंडित सुनील कृष्ण व्यास ने रास की कथा का मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि रास की कथा जीवन के हर रस को पूर्ण कर देती है. जो व्यक्ति रास की कथा का श्रवण करता है, उसके जीवन में फिर किसी रस की कमी नहीं रहती.

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छप्पन भोग और खाटू श्याम दरबार ने बांधा श्रद्धालुओं का मन

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस का आयोजन आज अत्यंत भक्तिमय, उल्लासपूर्ण और आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कथा स्थल श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति से गुंजायमान रहा। हर ओर “श्रीकृष्ण” नाम का संकीर्तन, भक्ति गीतों की मधुर ध्वनि और श्रद्धा की तरंगें वातावरण को पावन बना रही थीं।

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कैसे करूं बयाँ…

केदारनाथ की कठोर ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच एक मासूम बालक का निश्छल प्रेम यह सिखा गया कि सच्ची मानवता किसी सुविधा या संपन्नता की मोहताज नहीं होती. वही निस्वार्थ सेवा जीवन भर स्मृति बनकर हृदय में बस जाती है.

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नंद के घर आनंद भयो…भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिवस का आयोजन अत्यंत भक्तिमय, भावपूर्ण और उल्लासपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ. कथा स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने एकाग्रचित्त होकर कथा श्रवण किया. पूरे पंडाल में भक्ति और आनंद का वातावरण देखने को मिला.

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भरोसे से भगवान मिलते हैं : पूज्य श्री सुनीलकृष्णजी व्यास

श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास से परिपूर्ण वातावरण में श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस का आयोजन अत्यंत भावपूर्ण रूप से संपन्न हुआ। कथा स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भजन-कीर्तन, जयघोष और हरि नाम के संकीर्तन से संपूर्ण पंडाल भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने गहन एकाग्रता और भाव-विभोर मन से कथा श्रवण का पुण्य लाभ लिया।

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मुक्ति की राह : ज्ञान, कर्म और परमधाम

आत्मा परमधाम की वासी है—पवित्र, दोषरहित। स्थूल लोक में कर्मों के प्रभाव से वह अपवित्र होती है, इसलिए स्वयं परमात्मा आकर ज्ञान के माध्यम से आत्मा को फिर से पावन बनाते हैं और उसे मुक्ति की ओर ले जाते हैं।

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भक्ति, प्रेम और वैराग्य की दिव्य गंगा है श्रीमद् भागवत कथा

श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर भक्ति, प्रेम और वैराग्य का अनुपम संगम देखने को मिला। पूज्य श्री सुनीलकृष्ण जी व्यास ने गोपी गीत और राजा परीक्षित जन्म प्रसंग के माध्यम से निष्काम भक्ति और भगवान की करुणा का भावपूर्ण संदेश दिया। संपूर्ण वातावरण हरि नाम और भक्तिरस से सराबोर रहा।

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