बिना आत्मा के शरीर बेजान

ब्रम्हाकुमारी ऊषा भटूला, दिल्ली (मयूरविहार)

आज हर मनुष्य उस चीज़ को पाने के लिए भाग रहा है, जिसे वह अपने साथ ले ही नहीं जाएगा। न शरीर साथ जाएगा, न यह शोहरत। साथ जाएगा तो केवल वह कर्म, जिसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।

कभी एकांत में बैठकर सोचो जिनके लिए तुम रात-दिन धन कमा रहे हो, क्या वे तुम्हारे कर्म के सहभागी बनेंगे? नहीं, बिल्कुल नहीं। हर इंसान के अपने-अपने कर्म और विकर्म होते हैं; इसमें कोई लेन-देन नहीं चलता।

सोचो, जिस शरीर के ऐशोआराम के लिए हम कभी-कभी किसी का दिल तक दुखा देते हैं. आजकल तो हर दूसरा व्यक्ति अपने सुख के लिए दूसरे के अरमानों की बलि देने में तनिक भी नहीं हिचकिचाता। उसे सिर्फ अपने आप से मतलब है, या अपने परिवार से। आखिर दूसरा उसका लगता क्या है?

बस यही सोच उसे नरक की ओर धकेलती है। यही विकर्म उसे अशांति की ओर ले जाते हैं, और वह जीवन भर दुखी रहता है, क्योंकि वह केवल देह के सुख को जीता है, आत्मा के नहीं जबकि आत्मा ही शरीर को चलाने वाली शक्ति है।

बिना आत्मा के शरीर बेजान है, और आत्मा को अपने कर्म करने के लिए शरीर की आवश्यकता होती है। शव को किसी ने चलते-फिरते देखा है? नहीं न-शव तभी शव कहलाता है, जब आत्मा देह से निकल चुकी होती है।

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