जीवन एक संगीत

जीवन एक मधुर संगीत की तरह है, जिसमें सुख और दुःख उसके स्वरों की भाँति आते-जाते रहते हैं। संयम, विश्वास और परहित की भावना से भरा यह जीवन, गीता के ज्ञान को आत्मसात कर हर भव से पार हो सकता है। जब मन ईर्ष्या और लोभ से मुक्त होकर आशा, ममता और सत्य को अपनाता है, तब जीवन स्वयं एक संगीतमय चमन बन जाता है।

Read More

बिना आत्मा के शरीर बेजान

मनुष्य पूरे जीवन उस चीज़ के पीछे भागता रहता है जिसे वह मृत्यु के बाद साथ ले ही नहीं जा सकता। न शरीर उसके साथ जाता है और न ही शौहरत साथ जाता है तो केवल कर्म, जिसकी ओर वह सबसे कम ध्यान देता है। आज अधिकांश लोग अपने सुख के लिए दूसरों के अरमान कुचलने में भी हिचकते नहीं, यही विकर्म उन्हें भीतर से अशांत कर देता है। सच यह है कि बिना आत्मा के शरीर सिर्फ एक बेजान ढांचा है, और बिना शरीर के आत्मा कर्म नहीं कर सकती। शव तभी शव कहलाता है जब आत्मा देह से विदा हो चुकी हो।

Read More

जो खुद को नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना!

विद्या का वास्तविक अर्थ केवल तकनीकी ज्ञान या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह सबसे पहले स्वयं को जानने, समझने और जीवन के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को खोजने की प्रक्रिया है। यदि हम स्वयं को और समस्त प्राणी जगत को एक ईश्वर की रचना मानकर देखें तो जीवन की अधिकांश उलझनें स्वतः समाप्त हो जाती हैं। विद्या वही है जो हमें भीतर से शुद्ध बनाए, आत्मा को जानने का अवसर दे और बाहरी दिखावे के मोह से दूर रखे।

Read More