मातरानी के अनन्य स्वरूप

मातारानी की महिमा असीमित और अनन्य है। सृष्टि की हर क्रियाशीलता में उनका वंदन और पूजन होता है। दया, शांति, चेतना और सामर्थ्य के प्रतिरूप के रूप में, माँ ज्ञान से पूर्ण प्रकाशपुंज हैं। वह जीवन की सर्वशक्तिप्रदायिनी हैं, जो समस्त जगत की असुरी शक्तियों का संहार करती हैं और यश, रूप, आरोग्य व सौभाग्य प्रदान करती हैं।

माँ अमिय-स्रोत जैसी निरंतर नाद करती हैं और दुष्टों का दमन करने के लिए विकराल रूप धारण कर लेती हैं। प्रचंड दामिनी और रमा कामिनी के स्वरूप में वह भक्तों के हर संताप को हरती हैं और उनके मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।

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मां कुष्मांडा की स्तुति

“बुध ग्रह की स्वामिनी, ममता का रूप धारण करने वाली मां कुष्मांडा, भक्तों को रूप-बुद्धि प्रदान करती हैं और अष्टभुजा से दुष्टों का संहार करती हैं। नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर पीले रंग का पूजन, केसर पेड़ा और मालपुए का भोग अति प्रिय है।”

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माँ शैलपुत्री

सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उप्र) प्रथम शैलपुत्री देवी,आज नवरात्र में कृपा बरसाए माँ।भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। पहला दिन शैलपुत्री स्वरूप,पर्वतराज हिमालय की पुत्री तू।पूर्व जन्म में राजा दक्ष की थी पुत्री,तब माँ का नाम पड़ गया था सती।। तेरी महिमा सारी कह न सके माँ,भक्तों ने सारे तेरे मंदिर सजाए माँ।। सती…

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नवरात्रि: भक्ति से शक्ति की यात्रा

“नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। यह हमें हमारे भीतर की सुप्त शक्ति को पहचानने, हर कठिनाई में छिपे वरदान को देखने और आत्मविश्वास से अंधकार को मिटाने की प्रेरणा देता है।”

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नवरात्रि पर्व का हिन्दू धर्म में महत्त्व

“नवरात्रि का महत्त्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, आत्मबल और मानवीय जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला पर्व है। नौ रातों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना से भक्त अपने जीवन में शक्ति, साहस, ज्ञान और भक्ति का विकास करते हैं। उपवास और संयम शरीर को शुद्ध करते हैं, जबकि ध्यान, पूजा और मंत्रजप मन और आत्मा को पवित्र बनाते हैं।

यह पर्व हमें यह शिक्षा देता है कि सत्य और धर्म की विजय निश्चित है, जबकि असत्य और अधर्म का अंत होना अवश्यंभावी है। नवरात्रि का सांस्कृतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है—देशभर में गरबा, डांडिया और रामलीला जैसे उत्सव समाज में उत्साह, एकता और सहयोग की भावना जगाते हैं। साथ ही, यह पर्व स्त्री-शक्ति के आदर और सम्मान का प्रतीक है, जो हमें याद दिलाता है कि नारी केवल स्नेह और ममता की मूर्ति नहीं, बल्कि संकटों का सामना करने वाली साहस और संकल्प की प्रतिमूर्ति भी है।

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माँ का स्वरूप

माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।

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माँ दुर्गा का आगमन

माँ दुर्गा के आगमन और नवरात्रि के उत्सव का सुंदर चित्रण करती है। कवि ने माँ के नौ रूपों के वास, भक्ति और श्रद्धा के भाव, तथा उनके दुष्टों के नाश करने वाले रूप का वर्णन किया है। भक्त अपनी विपत्तियों और संकटों में माँ के सामने आता है, उनका उद्धार माँ से आशा करता है। माँ का रूप लाल चुनर, मुकुट और त्रिशूल के साथ दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है, और उनकी ममता और करुणा हर भूल और त्रुटि को क्षमा करने वाली प्रतीत होती है। भक्तों द्वारा हलवा-पूरी और चना जैसे भोग अर्पित किए जाते हैं, और वे माँ से आशीर्वाद की कामना करते हैं। पूरी कविता में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का वातावरण स्पष्ट है, जो संसार को माँ के प्रति प्रेम और सम्मान से मोहित करता है।

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महिदपुर रोड के एक मंदिर परिसर में संतोष विश्वकर्मा श्रद्धालुओं के साथ खड़े, पारंपरिक परिधान में, सेवा और समर्पण का प्रतीक दृश्य

सेवा ही सबसे बड़ी साधना

महिदपुर रोड के समाजसेवी संतोष विश्वकर्मा (भूरा सेठ), जिन्हें लोग “टेम्पल मैन” के नाम से जानते हैं, अपनी गहरी धार्मिक आस्था और निस्वार्थ सेवाभाव के लिए पहचाने जाते हैं। मंदिरों के जीर्णोद्धार, नवदुर्गा महोत्सव के आयोजन और कांवड़ यात्राओं में उनका समर्पण समाज के लिए एक प्रेरणा है। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें सेवा और विनम्रता का भाव हो।

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पितृपक्ष

पितृपक्ष का यह सोलह दिवसों का पर्व पूर्वजों की स्मृति और श्रद्धा का विशेष समय है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में भी यही बताया गया है कि आत्मा अजर-अमर है और श्राद्ध से हमें पुण्य मिलता है। कौए और गौ सेवा का विधान पितृपक्ष को और भी पावन बना देता है।

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आज लगेगा साल का अंतिम चंद्र ग्रहण

भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर आज साल का अंतिम खग्रास चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। यह खगोलीय घटना भारत समेत विश्व के कई हिस्सों में दिखाई देगी। ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 28 मिनट 2 सेकंड होगी।

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