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वरिष्ठ बाल साहित्यकार नीलम राकेश होंगी सम्मानित

बाल साहित्य के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय और सशक्त रचनात्मक योगदान देने वाली वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्रीमती नीलम राकेश को वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित ‘अखिल भारतीय अनुराग साहित्य सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान अनुराग सेवा संस्थान, लालसोट (राजस्थान) की ओर से प्रदान किया जा रहा है।

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सहनशीलता का अभाव और टूटते रिश्ते

हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।

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वह इकलौती पेंट और गर्म इस्त्री

वो मेरी इकलौती पेंट थी। रोज़ धोकर, सुखाकर, इस्त्री करके पहनी जाती। एक ही पेंट में हम स्कूल ऐसे पहुँचते जैसे राजा बाबू हों। एक दिन जल्दी में गर्म इस्त्री से हाथ जल गया, लेकिन दर्द से ज़्यादा डर इस बात का था कि कहीं पेंट न जल जाए। उस जलन का निशान आज भी है संघर्ष की याद बनकर।

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हवा का झोंका

हवा का वह झोंका, जो अपना रास्ता भूलकर आँगन में आया, जैसे पूरी जगह को जीवित कर दिया। मैं चुपचाप एक कोने में खड़ी थी, पास वाले घर से प्रार्थना की धुन कानों में गूंज रही थी। ठंडी हवा, टिमटिमाता दिया, और सुगंधित समय सब मिलकर उस पल को शांति और प्रकाश से भर देते थे। हर लम्हा जैसे सपनों का गीत गा रहा हो, और मेरी आत्मा भी उसी संगीत में घुलमिल रही हो।

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अब बात नहीं करोगे…

उस दिन उसने कहा-“अब बात नहीं करोगे।”
शब्द ठंडे थे, पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मैं मुस्कुरा दी और कह दिया-“मैं भी बात नहीं करूँगी।”
वास्तव में, हमने पहले ही बातचीत खो दी थी। मैं हर रोज़ उसके पास बैठकर कुछ पल चाहती थी. बस सुनना, समझना, साथ में रहना। लेकिन वह हमेशा जवाब देता रहा, पर कभी वास्तव में मौजूद नहीं था। महँगे तोहफ़े, बड़े रेस्टोरेंट, दिखावटी सुख, कुछ भी मेरे भीतर के खालीपन को भर नहीं सका।

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“तुम्हारे खतों का पुलिंदा”

तुम्हारे खतों का वह पुलिंदा, जिसे मैंने संदूक में संभाल रखा था, मेरे लिए समय की किताब बन गया है। हर खत अपनी कहानी कहता है कभी देर से उठने की डांट और चाय के ठंडे निशान याद दिलाते हैं, तो कभी तुम्हारी छुटकी की मुस्कान और टीचर की डांट में बचपन की मासूमियत झलकती है। कुछ खत चोट के निशानों, पहली तकरार की मिठास या पहला चुंबन याद दिलाते हैं।

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समय बदला पर मेरी यादों का मेला नहीं

गोगापुर का मेला मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बचपन की वह दुनिया है जहाँ उत्साह, जिज्ञासा और अपनापन एक साथ साँस लेते थे। बैलगाड़ी में बैठकर मेले की ओर जाना, दाल-बाटी की खुशबू में भूख से ज़्यादा आनंद महसूस करना और ज़मीन पर बैठकर टूरिंग टॉकीज़ में फ़िल्म देखना ये सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज मेला भले ही बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह अब भी वैसे ही जीवित है, जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो।

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तुम और तुम्हारी यादें…

उस स्त्री की पीड़ा जो भुलाने की हर कोशिश के बावजूद स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाती। वादों से भरे प्रेम का अचानक टूट जाना, चुपचाप सहा गया अत्याचार और अकेलेपन में बहते आँसू—सब मिलकर एक ऐसी कहानी रचते हैं जहाँ प्रेम भले ही दूर हो जाए, पर उसकी यादें भीतर ज़िंदा रहती हैं। दूरी के बावजूद दो आत्माएँ एक-दूसरे की प्रतीक्षा में बँधी रहती हैं, जैसे एक ही परिंदे के दो पंख।

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दो चेहरे

आज का समाज दो चेहरों में जी रहा है एक वह जो भीतर सचमुच है और दूसरा वह जो बाहर दुनिया को दिखाया जाता है। खुशियाँ अब साझा कम और तुलना ज़्यादा बन गई हैं, जहाँ किसी की तरक्की दूसरे के भीतर जलन जगा देती है। झूठे वादों और बनावटी शान-ओ-शौकत के शोर के बीच बचपन चुपचाप वही सीख रहा है जो हम जी रहे हैं। अगर समय रहते हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ी को सच्चाई नहीं, बल्कि सिर्फ़ दिखावे से भरी एक चमकदार लेकिन खोखली दुनिया विरासत में मिलेगी।

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पहले झगड़े थे, आज दूरी

हर इंसान अलग है उसकी सोच, सहने की क्षमता, बोलने का तरीका और चुप्पी की भाषा भी अलग होती है। फिर भी हम एक-दूसरे में खामियाँ खोजने लगते हैं और यही खामियाँ धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी बना देती हैं। आज परिवार छोटे हो गए हैं, लेकिन दिलों के फासले बढ़ गए हैं। जहाँ पहले प्रेम और सम्मान झगड़ों पर भारी पड़ते थे, आज अहंकार और असहिष्णुता रिश्तों को तोड़ रही है। साथ रहते हुए भी अकेले हो जाना, शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

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