जब आता था कलाई करने वाला: पीतल के बर्तनों की यादें”
महिदपुर रोड की गलियों में, कलाई करने वाला अपनी भट्टी और चमकीले पीतल के बर्तनों के साथ आता था। तपेली, डेकची और लोटे—हर बर्तन उसकी कला की छाप लिए होते थे। बच्चों की जिज्ञासा, धुएँ की हल्की गंध और भट्टी की आंच—सब कुछ बचपन की यादों में अमिट छाप छोड़ गया। यह केवल बर्तनों की कहानी नहीं, बल्कि उस समय की जीवनशैली, रिश्तों और परंपरा की सजीव झलक है।
