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पुणे बना ओपन लाइब्रेरी, 7 लाख लोगों ने पढ़ीं पुस्तकें

एक दिन के लिए ‘पुस्तकों की राजधानी’ बन गया. शहर के स्कूलों, कॉलेजों, ऑफिसों, मेट्रो, बस स्टैंड, धार्मिक स्थलों और आईटी पार्कों में लोगों ने एक साथ किताबें खोलकर ऐसा माहौल बनाया, मानो पूरा शहर एक विशाल ओपन लाइब्रेरी में बदल गया हो. ग्रुप रीडिंग की लगभग १०,००० तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा गईं और आयोजन को राजेश पांडे, रमेश पाटील, योगेश शिंदे, स्वाति देशमुख, प्रिया जाधव के नेतृत्व में ‘शांतता.. पुणेकर वाचत आहे’ अभियान को बड़ी सफलता मिली. शाम ५ बजे तक १ लाख ३५ हज़ार से ज़्यादा लोगों ने किताबें पढ़ीं और फोटो अपलोड करके वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया

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मोहब्बत में हार, जीवन में जीत…

अनंत, शहर में बड़े सपनों के साथ आया था, लेकिन पहली मोहब्बत ने उसे टूटने के कगार पर ला खड़ा किया। दृष्टि का धोखा, टूटे दिल और निराशा में वह समुद्र की ओर बढ़ा। तभी मां की आवाज़ ने उसे रोक दिया। मां की ममता और हौसले ने अनंत को जगाया, और उसने अपने सपनों और जिंदगी को फिर से गले लगाया। अब दर्द से सीख लेकर वह सफलता की ओर कदम बढ़ा रहा है।

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बदलता वक़्त

कभी अल्हड़ और शरारती रहे हम, अब समझदार होकर चुप्पी में जीना सीख गए हैं। मौसम, बारिश और दोस्तों संग बिताए हंगामे पीछे छूट गए। अब खुशियाँ भी मन में ही दबाकर रख लेते हैं। ज़िंदगी की राह पर निकले तो थे कहीं और, पर दिशा बदल गई और हम धीरे-धीरे बदलते गए।

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हे केशव, तेरी यह कैसी माया?

कभी साधारण जप सा लगता कृष्ण-नाम आज अचानक मन में तरंग बनकर उठा। जैसे ही भाव की एक बूंद हृदय में गिरी, भीतर का सारा सूखापन हर गया। लगा मानो केशव स्वयं दया कर उपस्थित हो गए हों। बरसों की पुकार, प्रतीक्षा और तड़प का उत्तर आज मिला। रोम-रोम भक्ति से भीग उठा यही क्षण जन्म का सार्थक होना है।

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कविता, ग़ज़ल और एहसासों का उत्सव

मुंबई के गोरेगांव स्थित मृणालताई हॉल में चित्र नगरी संवाद मंच द्वारा साहित्य, संगीत और संवेदना से सजी एक मनभावन शाम आयोजित हुई। सकारात्मकता-नकारात्मकता पर रोचक चर्चा, कालजयी कविताओं का पाठ, ग़ज़लों की महक और पुस्तक विमोचन ने इस कार्यक्रम को खास बना दिया। साहित्यकारों, कलाकारों और श्रोताओं की दमदार मौजूदगी ने पूरे माहौल को जीवित और अर्थपूर्ण बनाया।

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…जब कपड़ा लंबा-सिलता था और बचपन भी

आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।

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शांतता… पुणेकर वाचत आहेत

पुणे शहर और पिंपरी-चिंचवड़ मंगलवार, ९ दिसंबर को एक ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने जा रहे हैं्. पुणे पुस्तक महोत्सव २०२५ के अंतर्गत आयोजित विशेष उपक्रम ‘शांतता… पुणेकर वाचत आहेत’ में आज सुबह ११ से १२ बजे के बीच पूरा शहर एक साथ पुस्तक पढ़ने के अनोखे प्रयोग में सहभागी होने वाला है. इस एक घंटे के वाचन समारोह के माध्यम से पुणे विश्‍व रिकार्ड बनाने की दिशा में कदम बढ़ाएगा.

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बंदर के हाथ में उस्तरा !

विधानसभा में विपक्ष के विरोध का फैंसी ड्रेस शो जारी रहा। कांग्रेस विधायकों ने ‘बंदर के हाथ में उस्तरा’ थीम पर प्रदर्शन किया। छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव से कांग्रेस विधायक सुनील उइके बंदर बनकर आए थे। उनके हाथ में सांकेतिक उस्तरा भी था। कांग्रेस ने इस प्रदर्शन के जरिए आरोप लगाया कि भाजपा सरकार उस बंदर की तरह काम कर रही है, जिसके हाथ में उस्तरा है

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बाबूजी की हाथ घड़ी

मेरे पिताजी एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक थे, जिनकी तनख्वाह कम थी, लेकिन आत्मसम्मान और ज्ञान कूट-कूट कर भरा था। साल 1974 में उनके तबादले के समय, घर का सारा खर्च उधारी पर चलता था। घर का सामान बैलगाड़ी में शिफ्ट करना था, लेकिन पिताजी ने सबसे पहले 60 रुपए का उधार चुकाया। इसके लिए उन्होंने अपनी प्रिय सुनहरे डायल वाली हैनरी सैंडो घड़ी बेच दी।

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कभी-कभी गलतफ़हमी

कभी-कभी हमें भ्रम हो जाता है कि सामने वाला सच में प्यार करता है उसकी बातों में अपनापन दिखता है, इकरार के लम्हे भी सच्चे लगते हैं। वह गले लगकर समझने का दावा तो करता है, पर दुनिया के सामने वही समझ कमज़ोर पड़ जाती है और हमारी नासमझी गिनाई जाती है। मन जैसा चाहे वैसा प्यार दे भी दे, और इल्ज़ामों की बरसात भी उसी मन से कर दे तब रिश्ते बोझ बनते देर नहीं लगती।

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