बरसात, भक्ति और मेला
“बरसात से लबालब भरे गाँव का दृश्य। चारों ओर पानी ही पानी, ताल-तलैया और खेतों में भरे जल के बीच पगडंडी डूबी हुई है। कुछ ग्रामीण घुटनों तक कपड़ा उठाए, हाथ में चप्पल पकड़े सावधानी से रास्ता पार कर रहे हैं। बच्चे किनारे पर खड़े हँसते-खिलखिलाते तालियाँ बजा रहे हैं। दूर खुले-खुले पैतृक घर और हरसिंगार का पेड़ दिख रहा है, जिसकी झरती कलियाँ पूजा के लिए टोकरी में भरी जा रही हैं। पृष्ठभूमि में गाँव का दुर्गा पूजा पंडाल, मिट्टी की प्रतिमा, जलते दीपक और ढाक-वादन से गूँजता भक्तिमय वातावरण दिखाई दे रहा है।”
मां कुष्मांडा की स्तुति
“बुध ग्रह की स्वामिनी, ममता का रूप धारण करने वाली मां कुष्मांडा, भक्तों को रूप-बुद्धि प्रदान करती हैं और अष्टभुजा से दुष्टों का संहार करती हैं। नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर पीले रंग का पूजन, केसर पेड़ा और मालपुए का भोग अति प्रिय है।”
शाबाश… श्वेता
उज्जैन के छोटे कस्बे महिदपुर रोड से आई श्वेता बोथरा ने हौसले, दृढ़ निश्चय और लगन से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। महेश भट्ट और अनु मलिक के साथ डेब्यू कर उन्होंने साबित कर दिया कि असंभव कुछ भी नहीं। शिक्षा पूरी करने और मीडिया मैनेजमेंट में एमबीए के बाद श्वेता ने ओरकॉम एडवरटाइजिंग, इंदौर से करियर शुरू किया, लेकिन लेखन का जुनून उन्हें मुंबई ले गया।
उनकी लिखी फिल्म “तू मेरी पूरी कहानी” एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे प्यार और करियर के बीच कठिन निर्णय लेना होता है। श्वेता की कहानी हज़ारों लड़कियों और युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा है—सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए हौसला, मेहनत और जुनून ही सबसे बड़ा हथियार हैं।
आओ ज़रा जी लें
कविता में छिपे भाव जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अनदेखे लम्हों की याद दिलाते हैं। नीरसता और उदासी में भी हम अपने भीतर की रौशनी को खोज सकते हैं। यादों में मुस्कुराते हुए लम्हे, जीवन के कठिन समय में भी राहत और उत्साह की ठंडी हवा बनकर हमारे मन को सहलाते हैं। ये लम्हे हमें याद दिलाते हैं कि हर पल एक कविता है, जो जीवन की महाकाव्य रचना में नए छंद जोड़ती है। इसे जीना, उसे महसूस करना और हर पल को उत्सव में बदल देना ही जीवन की असली खुशी है।
ज्ञान परंपरा और भूगोल पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला
सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन में “भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेष संदर्भ में भूगोल विषय” पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन हुआ। इस अवसर पर कुलगुरु प्रोफेसर अर्पण भारद्वाज के निर्देशन में कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में भूगोल विषय के पाठ्यक्रम निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा को समाहित करना है।
पट समय के खोलने दो
कविता की हर पंक्ति भीतर से निकलती हुई आत्मा की पुकार थी। उसने खुद को दीप की तरह जलने दिया, ताकि उसकी रौशनी चारों ओर फैले। कैद की दीवारें अब उसे रोक नहीं सकती थीं; हँसने, बहने और खुलकर जीने का समय आ गया था।
भीतर की नदी को जब उसने खोल दिया, तो उसके किनारे टूट गए और जहाँ भी पड़ी, जीवन भीग गया। भूले हुए राग अब ताल में लौट आए, खलिश की पुरानी यादें गीत बनकर बह गईं। जीवन के फीके रंग अब नए सपनों के रंग में घुलने लगे। हवाओं की घुटन और रात की निशा भी खुल गई; समय के पट अब खुल चुके थे।
यह कविता एक स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की कहानी थी—जहाँ भीतर की ऊर्जा और रचनात्मकता खुलकर बहती है, और आत्मा को अपनी पूरी क्षमता के साथ जीने का अवसर मिलता है।
आत्मसंतुष्टि
बरसों बाद जब रेणू ने कलम उठाई, उसके दिल और दिमाग में अजीब सी मस्ती फैल गई। शब्दों का सागर उसके भीतर गोते लगा रहा था, और दिमाग उस सागर से मोती चुनकर उन्हें पंक्तियों में सजाने में व्यस्त था। भावनाओं की लहरें उठ रही थीं, और उसकी नाव—जो कविता का रूप धारण कर चुकी थी—उन लहरों को पार कर रही थी। हर शब्द, हर भाव उसे आत्मसंतुष्टि के द्वार तक ले गया। रेणू ने महसूस किया कि लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का साधन भी है। उसकी नाविक बनकर, वह अपनी रचनात्मकता की शक्ति को महसूस करते हुए आत्मसंतुष्टि के द्वार पर पहुँच गई।
सिंदूर-खेला
पूजा पंडाल में ढोल की थाप गूँज रही थी। विसर्जन से ठीक पहले का दिन! लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी में सजी महिलाएँ माँ दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर, एक-दूसरे की माँग और गालों पर रंग भर रही थीं।
भीड़ के बीच खड़ी रितुपर्णा बाहर से मुस्करा रही थी, मगर भीतर खालीपन था। कुछ महीने पहले पति ने शराब के नशे में घर से निकाल दिया था। अकेली रहती तो ठीक था, पर बच्चे की परवरिश? सोचकर दिल डूब जाता।
तभी उसकी नज़र पंडाल के कोने में गई—एक आदमी अपनी पत्नी पर चिल्ला रहा था। अगले ही पल गाल पर जोरदार थप्पड़! भीड़ ने देखा, पर सब चुप। औरत आँचल मसलती, आँखें झुकाए आँसू पोंछ रही थी।
शक्ति हो माँ
माँ, तुम ममता की मूर्ति हो, धीरज और करुणा का अथाह सागर। तुम्हारे आगे शब्द भी छोटे पड़ जाते हैं। आकाश तुम्हें नमन करता है और धरती तुम्हारी आरती उतारती है। जीवन के हर सुख-दुख में तुम्हारा हाथ थाम लेने से मन को संबल मिलता है। मेरी प्रत्येक साँस तुम्हारी ही देन है, हर क्षण तुम्हारे ध्यान में ही बीतता है।
जब-जब मन डगमगाता है, आँखों में तुम्हारा रूप बसाकर स्थिरता मिलती है। तुम्हारे चरणों में सिर झुकाना ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। अंतिम क्षणों में भी यदि तुम्हारे दर्शन मिल जाएँ तो जीवन सार्थक हो जाएगा।
