LIVE WIRE NEWS NETWORK

सूखी और बंजर जमीन के बीच उजड़ा हुआ भारतीय गाँव और खामोश बैठे लोग

तीन शब्द

समाचार पत्र के आठवें पृष्ठ के एक छोटे से समाचार ने उसे हिला दिया “ गाँव बिकाऊ है “| उसने इन तीन शब्दों को कई – कई बार पढ़ा | सोचने लगा , आवश्यकता और सुख के साथ – साथ पशु – पक्षी और मनुष्य तो बिक ही रहे थे अब गाँव भी ..`..
अजीब सा लगा उसे | घबराहट सी हुई |उसने अपने बैग को उठा कर गले में डाला और बाइक निकाल जा पहुंचा उस गाँव जहां बड़े – बड़े समाचार – पत्रों , चैनल्स की गाड़ियां साथ ही सरकारी तंत्र और वसाइयों की भी गाड़ियाँ खड़ी थीं | कैमरे चमक रहे थे | दाम लग रहे थे …
पता है किसके ……धूल उड़ाती , दरारों पटी बंजर जमीन के … अपनी ही गहराई नापते कुओं के … घर मकानों के… कोई नहीं पूछ रहा था पशुओं को ? न ही वहाँ के लोगों को ?

Read More

नारी — जननी भी, शक्ति भी

नारी गहनों या दौलत की चाह नहीं रखती, उसे चाहिए सिर्फ़ सम्मान और बराबरी का हक़। वह माँ है, बहन है, बेटी है और पत्नी है—हर रूप में जीवन को सँवारती है। उसके भी अपने सपने हैं, अपनी इच्छाएँ हैं। लेकिन समाज अक्सर उसे कमज़ोर समझकर उसकी स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करता है। सच्चाई यह है कि नारी कोमल ज़रूर है, पर निर्बल नहीं। वह कर्तव्यों का पालन करती है और प्रेम से जीती है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उसकी भावनाओं और अस्तित्व का सम्मान करें।

Read More

मीरा का मन

मीरा का जीवन समाज और परिवार की परंपराओं से परे, एक अद्भुत और अद्वितीय प्रेम का प्रतीक था। उसने राजमहल की सारी सुख-सुविधाएँ त्याग दीं और केवल अपने गिरधर गोपाल को ही अपना सर्वस्व मान लिया। जहाँ एक ओर लोग उसे समझाने का प्रयास करते कि कृष्ण तो राधा और रुक्मिणी के हैं, वहीं मीरा के लिए उनका प्रेम सांसारिक पाने और खोने से परे था। मीरा के हृदय में कृष्ण केवल पति या स्वामी नहीं, बल्कि आत्मा के आधार बन चुके थे। उसके लिए यह प्रेम किसी बंधन, किसी सामाजिक मान्यता से नहीं बंधा था। इसी अनुराग ने उसे विष भी अमृत जैसा प्रतीत कराया और हर पीड़ा को भक्ति में बदल दिया। मीरा का यह निस्वार्थ और आत्मिक प्रेम आज भी सच्चे समर्पण की अमिट मिसाल के रूप में जीवित है।

Read More

माँ के दो हाथों की टोकरी

माँ के दो हाथों की टोकरी में ज़िंदगी सिमटी रहती है। कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ हैं, बिल्कुल सटीक नहीं, लेकिन उनमें वही अपनापन है जैसे माँ की हथेलियाँ। वह टोकरी, जिसमें माँ एक जीवन को सम्भालकर रखती है, उसे पालती-पोसती है, दुलारती है। समय बीत गया, दुनिया बदली, मैं भी बहुत बदल गई, पर तेरे भीतर अब भी वही मासूमियत है—वही छोटे-से बच्चे की छवि, जो छोटी-छोटी गलतियाँ दोहराता है और माँ की हथेली पर सुरक्षित रहता है। लेकिन इस जंगल जैसी दुनिया में तुझे कैसे रखूँ? यही सोचकर दिल कांप जाता है। आ जा फिर मेरी हथेली में, छुप जा आंचल में, चैन से सो जा। इस भागदौड़ और छल-कपट को भूल जा, क्योंकि यह जीवन-जंगल कोई खेल नहीं। इसका अंत केवल एक “जंगल-आग” है।

Read More

विज्ञान और आस्था का संगम है टैरो

आज की तेज़-तर्रार ज़िंदगी में जब लोग करियर, रिश्तों और आर्थिक अस्थिरता को लेकर परेशान रहते हैं, तब कुछ लोग वैदिक विद्या और रहस्यमयी विज्ञान की ओर मुड़ते हैं. इन्हीं विद्या में टैरो कार्ड रीडिंग, अंक ज्योतिष और वास्तु शास्त्र शामिल हैं. इन विषयों पर गहरी पकड़ रखने वाली एक जानी-मानी विशेषज्ञ गोरखपुर की पूनम शर्मा से विशेष बातचीत के प्रमुख अंश-

Read More

तेरी बिंदी

आज तुम्हारे भाल पर बिंदी बीचों-बीच सजनी चाहिए थी, पर तुमने उसे किनारे सरका दिया। यह कैसी गुस्ताख़ी? बस उसी को ठीक करने आया हूँ।”
उसने नंदिनी की बिंदी को मध्य में सजाया, और उसी क्षण उनकी साँसें थम-सी गईं।
रात को नंदिनी ने वही बिंदी आईने पर चिपकाते हुए धीमे से कहा—“अब यहाँ विराजिए निखिल जी… र हाँ, आँखें बंद रखना।”अगले दिन जब उसने निखिल का स्केच देखा, उस पर लिखा था—
“एक संपूर्ण रमणी नंदिनी।”

Read More

कन्हैया

मैं कन्हैया को ढूँढ रही हूँ। घर, बाहर, देहरी, हर द्वार पर तलाश करती हूँ, पर न जाने किन कुंज-गलियों में वह छिपा हुआ है, मानो आज फिर मटकी फोड़ने आया हो।वह तनिक भी पास नहीं आता। छलिया रोज़ कोई न कोई छल करके निकल जाता है। मैं मथ-मथकर माखन तैयार करती हूँ, पर पता नहीं वह इसे कैसे भोग लगाता है।वह चोर की तरह घर के भीतर आ जाता है, हंडिया से माखन ले जाता है। मैं सोचती हूँ कि उसे कैसे पकड़ूँ, लेकिन वह तो क्षण भर में अदृश्य हो जाता है। अब तो कोई उपाय बताओ। उस माखन चोर को ढूँढकर लाओ। नंद बाबा से जाकर कोई कहो, ताकि मेरे इस व्याकुल हृदय को चैन मिल सके।

Read More

बगुलाभगत

तुमने मित्रता का हाथ बढ़ाया और मैंने उसे सच्चे मन से स्वीकार भी किया। यह अनुभव मुझे एक नई ख दे गया – कि हर नए मित्र को परखकर ही अपनाना चाहिए। तुम्हें यह भ्रम रहा कि तुम्हारी मित्रता मुझे जीवन भर अभिमान देगी, लेकिन धीरे-धीरे मैं समझने लगी कि मित्रता में स्वार्थ छिपा होता है और उसका सत्य अक्सर कटु होता है।
तुम्हारी खट्टी-मीठी बातें, दिखावे की आवभगत और गरिमामयी उपस्थिति मुझे किसी बगुला भगत से कम नहीं लगी। मेरी बेरंग जिंदगी में रंग भरने की तुम्हारी कोशिश झूठी थी, और प्रेम प्रसंगों की ठिठोली मेरी आस्था को भीतर ही भीतर जला रही थी। तुम्हारी झूठी तारीफें, बनावटी शानोशौकत और ऊँची-ऊँची बातें मेरी अस्मिता पर आघात कर रही थीं। मेरे कंधे तुम्हारे सपनों का बोझ ढोते रहे, और तुम्हारी प्रसिद्धि की लालसा मेरी आहुति को प्रश्नांकित करती रही। तब मैंने जाना कि तुम्हारी मित्रता सच में कफन जैसी सफेद और मौत जैसी ठंडी है।

Read More

साहित्य कला चौपाल द्वारा सम्मान समारोह संपन्न

पुराना कोर्ट परिसर में 15 अगस्त 2025 को सायं 4:30 बजे से स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर काव्य मंच साहित्य कला चौपाल के बैनर तले एक गरिमामय सम्मान समारोह सह काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम का संयोजन मंच की संस्थापक-अध्यक्ष अनीता सिंह, महासचिव कृष्णा दीदी एवं सचिव निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी के नेतृत्व में हुआ. कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण विद्या वाचस्पति सम्मान के अंतर्गत साहित्यकारों का सम्मान रहा. हरिद्वार में प्राप्त इस प्रतिष्ठित सम्मान की निरंतरता स्वरूप तीन वरिष्ठ साहित्यकारों सविता सिंह मीरा, निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी एवं अरविंद तिवारी को विशेष रूप से सम्मानित किया गया.

Read More

तिरंगा – हमारा मान

भारत में “तिरंगा” शब्द भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को संदर्भित करता है। हर स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को आयोजित संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और उसके बाद भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कार्य करता रहा।

Read More