
सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
कुछ शब्द समय के साथ खो जाते हैं. पेम भी उन्हीं शब्दों में से एक है.आज के बच्चे शायद ताज्जुब करेंगे कि यह कौन सी चीज थी? पर हमारे समय में इसी पेम से अक्षरों की खेती होती थी, इसी से सपनों के बीज बोए जाते थे. पहला अ और आ हमने उँगलियों से नहीं, पेम की खुरदरी चुभन और स्लेट की काली सतह पर उकेरी मेहनत से सीखा था.
याद आता है, बाबूजी कैसे बड़े अक्षर स्लेट पर बनाकर रखते…हम उनके बनाए अक्षर के ऊपर-ऊपर घोटा करते, जैसे उनके हाथ पकड़कर चलना सीख रहे हों.इसलिए शायद लिखावट आज भी सीधी-सादी और सधी हुई लगती हैजैसे बचपन की सच्चाई अक्षरों पर उतर आई हो.
स्लेट और पेम हमारी छोटी-सी दुनिया
उस समय स्लेट तीन तरह की मिलती थी.पत्थर वाली, पुष्टे वाली और पतरे वाली. पुष्टे और पतरे वाली भले ही न टूटती हों, पर बाबूजी कहते कि बच्चे लड़ गए तो पतरा चला देंगे, चोट ज्यादा लगेगी. पत्थर वाली स्लेट टूटेगी तो गलती समझ आएगी.ये बात तब नहीं समझ आई थी, पर आज समझते हैं.टूटने से सीख मिलती है.
हमारी स्लेट टूटती थी तो मन भी थोड़ा टूटता था.कभी आधी पर चलाना पड़ता, कभी किनारे से लिखना. पर उसी से सीखा कि जो है उसे बचाकर रखना पड़ता है, हर चीज़ की कीमत होती है.
पानी पोता-एक छोटी दवात, एक पूरा अनुभव
स्कूल के बस्ते में किताबों से ज्यादा धड़कनें भरी रहती थीं.कहीं स्लेट टूट न जाए, कहीं पेम गुम न हो जाए. साथ में होती थी एक पुरानी दवात, जिसमें भरा पानी. रुई या कपड़े का छोटा-सा टुकड़ा हमारा पोंछा.स्लेट पर पानी फेरते यानी पानी पोते तो अक्षर मिट जाते..पर मन में जो बचपन लिख रहा था, वह कभी न मिटा.
कुछ साथी थूक से स्लेट साफ करते थे. हम नाक सिकोड़कर तुरंत शिकायत करते- सर! देखो ये पट्टी पर थूक लगा रहा है!
तब यकीन था थूक से विद्या नहीं आती है.असल में वह विद्या आदर की, स्वच्छता की, अनुशासन की थी.
बचपन का पहला व्यापार
थोड़ा-सा व्यापार हमने अनजाने में सीखा,एक पेम का छोटा टुकड़ा दे दो,बदले में पानी पोता मिल जाए.कोई साफ करवाए, कोई पेम मांगेबार्टर सिस्टम चल निकला था.एक हाथ दो, एक हाथ लो.पर वह व्यापार केवल खेल था.दिल से निश्छल बिना फायदों की गिनती के.आज सोचते हैं.रिश्तों में भी कभी ऐसा ही व्यापार होना चाहिए था,
जहाँ लेन-देन में भावनाएँ हों, हिसाब-किताब नहीं.वो पेम अब कहाँ?वक्त बदलता गया.पेम लकड़ी के बुरादे वाली पोटली से निकली रंगीन पेंसिलों में बदल गई. कितनी सुंदर, कितनी चमकदार!पर सच पूछो तो उस खुरदरी पेम की एक धारी भी दिल में गहरी उतरती थीजितना यह रंगीन दुनिया कभी न उतर पाई. मंदसौर के रिश्तेदार गर्मियों में किलो भर पेम लाते थे.
घर में पाउडर-सी गंध भर जाती,जैसे बचपन किसी बोरसी में आग के समान धीमे-धीमे धधक रहा हो.हर रविवार हम स्लेट को कोयले से रगड़कर चमकाते.स्लेट पर पहली लकीर चलने की कर्र-कर्र आवाज आज भी कानों में ताज़ा है. कोई उस आवाज को शोर कहेगा,पर हमारे लिए वह सीख का संगीत था. आज जब बच्चे टचस्क्रीन पर अक्षर बनाते हैं.तो मन कहीं गहरे पूछता हैक्या उन्हें भी वही सादगी का सुख मिलता है?क्या पेम की तरह उनकी यादें भी हाथ गंदे करके बनती हैं?क्या स्क्रीन से मिटता अक्षर उसी तरह आत्मा में छपता है. जैसे स्लेट पर मिटा अक्षर मन में बन जाता था?शायद नहीं.क्योंकि हमारी शिक्षा सिर्फ किताबों में नहीं, टूटती स्लेट, घिसती पेम और पानी पोते की बूंदों में थी. एक पेम में कितना कुछ छुपा था.अक्षर, अनुशासन, जिम्मेदारी, मासूम व्यापार, बचपन का खेल और यादों की धूल.आज पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है.हमने केवल अक्षर नहीं सीखे थे,
हमने जीवन सीखा था.

बहुत शानदार हम सब ने स्लेट के साथ बचपन जिया है। स्लेट जिसे सीने से लगाए बड़े ध्यान से लेकर जाते थे कि लिखा हुआ कुछ मिट न जाए और जब कभी स्लेट साफ करने के लिए पानी थोड़ा सा ज्यादा लग जाता था तो बड़ी मासूमियत से एक हाथ स्लेट पर और फिर वही हाथ अपने सीने पर रखकर कहते थे …नदी का पानी नदी में जा ,मेरी पट्टी सूख जा….। उस वक्त कहां समझ में आता था कि कपड़े की वजह से पट्टी साफ हो रही है। हमें तो यह जादू की तरह लगता था। एक बात और सच लिखी है आपने पट्टी टूटे से ही मन भी टूट जाता था
पुरानी यादों को उकेरने में आप माहिर है,
वह यादें जो आपकी, मेरी, इसकी, उसकी ….शायद हमारी पीढ़ी की हर एक की स्मृतियों में जीवंत हो उठती है।
स्लेट पर पहली लकीर चलने की आवाज को महसूस कर पा रही हूं मैं।
और विजया जी का – नदी का पानी सूख पट्टी….. भी उन्हें यादों की एक कड़ी है।