बचपन की स्लेट, मासूमियत की तालीम

एक पेम में पानी पोतकर स्लेट पर अक्षर उकेरना यही तो हमारा पहला विद्यालय था। उंगलियों की पकड़, बाबूजी की बनाई लकीरों पर चलना, स्लेट का टूटना और फिर भी सीखने का हौसला… सब याद है। आज बच्चे टचस्क्रीन पर लिखते हैं, मगर हमें अक्षर पेम की खुरदरी चुभन से मिले थे। पानी पोतने से अक्षर मिटते थे, पर बचपन के सबक मन में उतनी गहराई से छप जाते थे कि आज भी स्मृतियों की स्लेट पर चमकते हैं। सच कहें तो हमने सिर्फ अ-आ नहीं सीखा था, हमने जीवन सीखा था।

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छप्पन वर्ष

“पचपन नहीं… छप्पन बरस हो गए हमारी शादी को।”वृद्धा ने हँसते हुए कहा, और वृद्ध भी मुस्करा दिए। सुबह से ही फोन की ट्रिन-ट्रिन ने उन्हें परेशान किया था, पर अब समझ आया. यह बच्चों की शुभकामनाओं की आवाज़ें थीं।
यादों की परतें खुलीं—इलाहाबाद के दिन, बच्चों की हंसी, कंधों पर बैठा कर दिखाई गई चौकी, रजाई के भीतर की मूँगफली… और आज वही बच्चे हिसाब मांगते हैं, शिकायतें करते हैं। पर इस सुबह आदित्य के गुलदस्ते और अर्चना की हंसी नेवृद्ध दंपति की आँखों को बारिश की बूँदों-सा चमका दिया।

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