वो शाम…

वो शामें कभी कितनी खूबसूरत हुआ करती थीं समंदर के किनारे आपके कंधे पर सिर टिकाकर डूबते सूरज की लालिमा को निहारना, लहरों में उसका प्रतिबिंब देख थम-सा जाना। समुद्र की जलतरंगें भी तब मानो हमारे प्यार का सुर छेड़ती थीं। आपका हाथ मेरे हाथ में होता, तो लगता था जैसे सारी दुनिया हमारे भीतर सिमट आई हो। बच्चों की मासूम आवाजें, समंदर किनारे की हलचल सब कुछ अपनी जगह था, पर हमारे बीच एक शांत-सी खुशी बहती थी।

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बचपन की स्लेट, मासूमियत की तालीम

एक पेम में पानी पोतकर स्लेट पर अक्षर उकेरना यही तो हमारा पहला विद्यालय था। उंगलियों की पकड़, बाबूजी की बनाई लकीरों पर चलना, स्लेट का टूटना और फिर भी सीखने का हौसला… सब याद है। आज बच्चे टचस्क्रीन पर लिखते हैं, मगर हमें अक्षर पेम की खुरदरी चुभन से मिले थे। पानी पोतने से अक्षर मिटते थे, पर बचपन के सबक मन में उतनी गहराई से छप जाते थे कि आज भी स्मृतियों की स्लेट पर चमकते हैं। सच कहें तो हमने सिर्फ अ-आ नहीं सीखा था, हमने जीवन सीखा था।

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