उस दोपहर..
कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर के खालीपन से होता है। “पटरी के उस पार” एक ऐसी ही कहानी है, जो एक नवविवाहिता के मन के उस सूनेपन को उजागर करती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता।

कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर के खालीपन से होता है। “पटरी के उस पार” एक ऐसी ही कहानी है, जो एक नवविवाहिता के मन के उस सूनेपन को उजागर करती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता।
कुछ पतों के पते कभी मिलते नहीं, और कुछ खतों के जवाब लौटकर नहीं आते। ये कविता अधूरी मोहब्बत, अनकहे जज़्बात और खामोश इंतज़ार की एक सजीव तस्वीर पेश करती है—जहाँ भावनाएं शब्दों से कहीं ज़्यादा कह जाती हैं।
राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।
उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।
जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।
“जिन्हें तोड़ा जाता है, वे पीपल के समान फिर उगते हैं पूरी शिद्दत के साथ।
जहाँ उम्मीदें नहीं होतीं, वहाँ भी हरे-भरे बने रहते हैं।स्त्रियाँ भी ऐसी ही होती हैं जहाँ कुचली जाती हैं,
वहीं अत्यंत सहनशीलता के साथ दोबारा उगती हैं।
“एक माँ ने अपने सारे सपनों को चुपचाप समेटकर अपनी बेटी के भविष्य के नीचे रख दिया. कभी उसने खुद को डॉक्टर के रूप में देखा था, लेकिन हालात ने उसे उस मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उसे अपने अरमानों से ज्यादा अपनी बेटी के सपनों को चुनना पड़ा. उसने बिना किसी सहारे, बिना किसी शिकायत के हर मुश्किल को अपनाया और हर दिन सिर्फ एक ही लक्ष्य के साथ जीती रही अपनी बेटी को उड़ान देना.
कटहल सिर्फ सब्ज़ी नहीं, बचपन की मिठास है — नानाजी के घर पके कटहल का स्वाद, नानी के गोवा से लाए कटहल के तीखे पापड़, भुने हुए काजू और वो हँसी के ठहाके, जब हम सोचते थे कि हम ही हैं जो पूरा कटहल खा जाते हैं। अब सिर्फ स्वाद की यादें हैं — और हर मौसम में एक उम्मीद कि कहीं से फिर आ जाए वो पुराना कटहल…”
यह रचना एक छूटी हुई कॉल के बहाने मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध, थकान और रिश्तों की अनकही दूरियों को उजागर करती है। रोज़मर्रा की भागदौड़, शारीरिक पीड़ा और मानसिक उलझनों के बीच छूटे छोटे-छोटे क्षण किस तरह गहरे पछतावे में बदल जाते हैं, यही इसका केंद्र है। एक साधारण-सी छूटी कॉल यहाँ जीवन के बड़े संकट, टूटते संबंधों और भीतर की असुरक्षा का प्रतीक बन जाती है।
आज के दौर में, जब हर व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा है, उसकी सबसे बड़ी लड़ाई खुद से ही है। “शून्यकाल” कविता इसी आंतरिक संघर्ष और अस्तित्व की खोज को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करती है। कविता में ‘मैं’ का पात्र खुद को खाली और शून्य महसूस करता है, जहाँ शब्द तो हैं, पर उनके पीछे कोई ठोस अर्थ नहीं बचा।
मैं मुक्त होना चाहती हूँ — यह सिर्फ एक ख्वाहिश नहीं, बल्कि मेरी आत्मा की पुकार है। उन अदृश्य ज़ंजीरों से आज़ाद होने की चाह, जो मेरे विचारों, रिश्तों और सपनों को जकड़े हुए हैं। यह एक सफर है खुद को पहचानने का, अपने भीतर के डर को हराने का, और उस जीवन को जीने का, जहाँ मैं बिना किसी शर्त के खुद को स्वीकार सकूँ।”
इतने सालों के बाद जब पीछे लौटकर देखता हूं, तो लगता है प्रेम और सौभाग्य कई बार मेरे दरवाज़े तक आए थे—पर मैं ही झेंपू, अनाड़ी और मौक़ा चूक जाने वाला रहा। कॉलेज की वो लड़की, लाइब्रेरी का वो एकांत, और वो घड़ी जब किसी के घर का पावभाजी मेरी याददाश्त का स्थायी हिस्सा बन गई—सब मुझे आज भी टटोलते हैं। और जब एक दिन किसी ने कहा, “तुम्हें ब्राह्मण समझकर बहन के लिए पसंद किया था,” तो लगा, क्या प्रेम जाति का मोहताज होता है?