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कमियाँ हर इंसान में होती हैं, लेकिन बदनाम सिर्फ चाँद होता है. यह कविता चाँद की खूबसूरती, उसकी चाँदनी और इंसानी सोच की गहराई को बेहद भावुक अंदाज़ में प्रस्तुत करती है.

चांद में दाग

चाँद में दाग़ जरूर होता है, लेकिन मानव भी कभी पूर्ण नहीं होता। कमियाँ सभी में होती हैं, फिर भी केवल चाँद ही बदनाम माना जाता है। उसकी खूबसूरती, गुण और चाँदनी की रौशनी, अंधेरे को काट देने की क्षमता, पूर्णमासी की छटा—सब कुछ अद्भुत है। अमावस की रात को उसकी कमी महसूस होती है, लेकिन आसमान में उसकी सुंदरता और प्यारा प्रभाव सबको भाता है। अक्सर लोग केवल दोष देखते हैं, जबकि अगर हम अपने गिरेबान में झाँकें, तो पता चलता है कि हमारी खुद की कमियाँ भी उतनी ही स्पष्ट हैं।

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माँ का पीतल का संदूक

माँ का पीतल का संदूक—छोटा, पर सोने-सा चमकता। उसमें सहेजे गए गहने, सिक्के, पान और यादें पीढ़ियों की परंपरा और स्नेह का दीप हैं। बचपन से मुझे खींचने वाला यह संदूक अब मेरी नई यादों और ज्वेलरी का घर बन गया है।

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पिंक फ्रॉक

पिंकी की ज़िद नई पिंक फ्रॉक की थी, लेकिन जब उसने अपनी सहेली मुन्नी को फटे-पुराने कपड़ों में देखा तो उसका मन बदल गया। उसने अपनी सुंदर फ्रॉक मुन्नी को दे दी। उस पल उसे समझ आया कि असली खुशी पाने में नहीं, बाँटने में है।

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चांद को ग्रहण

चाँद को ग्रहण लगने की बात केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि भावनाओं और विश्वासों से जुड़ी है। प्रेम का प्रतीक यह चाँद कभी उपहास का पात्र नहीं बन सकता। सच तो यह है कि चाँद को ग्रहण नहीं, बल्कि नज़र लगती है—क्योंकि हर पूर्णिमा को पूरी दुनिया उसे निहारती है, उसकी सुंदरता को नज़र भर-भरकर देखती है। यही कारण है कि कभी वह बादलों में छिप जाता है, तो कभी लोग उसे नज़र उतरने के लिए दुआओं और टोटकों में बाँध देते हैं। वास्तव में चाँद सदा निर्मल है, ग्रहण तो हमारी धारणाओं का है।

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सूरीनाम हिन्दी परिषद् का 48वाँ वार्षिकोत्सव उत्साहपूर्वक संपन्न

हिन्दी भाषण प्रतियोगिता व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन सूरीनाम हिन्दी परिषद् का 48वाँ स्थापना दिवस एवं हिन्दी पखवाड़े का शुभारंभ पाँच सितंबर को धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर “हिन्दी भाषण प्रतियोगिता” का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने अपनी वक्तृत्व कला से श्रोताओं को प्रभावित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री करन जागेसर…

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नमन उन पितरों को, जिनसे है हमारी पहचान

पितृपक्ष केवल स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने वाले संस्कारों और धरोहरों का अनुभव है। पितर कहीं दूर नहीं जाते, वे हर आँगन, हर देहरी और हमारे हावभाव तक में बसे रहते हैं। उनकी दी हुई सीख और आशीष ही हमें जीवनभर संबल देती है और हमारी पहचान को सहेजती है।

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परवरिश…

परवरिश, दरअसल वह निरंतर साधना है जहाँ संतान रूपी बीज को हम प्रेम, स्नेह और संस्कार की सिंचाई से अंकुरित करते हैं। समय-समय पर उचित मार्गदर्शन और देखभाल से यह पौधा धीरे-धीरे एक ऐसे वृक्ष में बदलता है, जो भविष्य में न केवल जिम्मेदार और संवेदनशील होता है, बल्कि समाज और परिवार के लिए फलदायी भी सिद्ध होता है।

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मुंबई: जहां हर धक्का सिखाता है जीना

मुंबई का आकर्षण दूर से देखने पर समंदर की लहरों, हैरिटेज इमारतों और तेज़ रफ्तार भागती ज़िंदगियों में नज़र आता है। लेकिन असली मुंबई की पहचान लोकल ट्रेनों की धक्का-मुक्की, जद्दोजहद और संघर्ष में छिपी है। यहाँ हर धक्का इंसान को जीना सिखाता है और हर मुश्किल उसे मज़बूत बनाती है।”

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सबसे सस्ती है आम आदमी की जान

अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज नमक मानी गई है। पर रुकिए, सबसे सस्ती चीज नमक नहीं है, बल्कि अपने यहाँ सबसे सस्ती चीज है आम आदमी की जान।
असल में आम आदमी कहीं भी, कैसे भी मर सकता है; मार दिया जाता है या व्यवस्था की लापरवाही उसे मार डालती है और अगले दिन सब भुला दिया जाता है। आम आदमी की जान इतनी सस्ती है कि रहनुमाओं को कोई फर्क ही नहीं पड़ता।

मंदिरों में पर्वों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और अफरातफरी से, रेल दुर्घटनाओं से, पुल गिर जाने से, बनती इमारत ढह जाने से, स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ में मारामारी से, रेलवे स्टेशन पर कुचलने से, मेलों-ठेलों में दबने से, घंटों जाम लगने से आम आदमी की जान चली जाती है। आम आदमी की जान, जान नहीं बल्कि मामूली सी चीज है। टेंशन क्या लेना, रोज ही तो मरते हैं।

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आज लगेगा साल का अंतिम चंद्र ग्रहण

भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर आज साल का अंतिम खग्रास चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। यह खगोलीय घटना भारत समेत विश्व के कई हिस्सों में दिखाई देगी। ग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 28 मिनट 2 सेकंड होगी।

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