प्रेम की छोटी सी सल्तनत

आप इतनी तंग गलियों से गुज़र कर यहाँ तक आई हैं!”
लड़की मुस्कुरा दी।
लड़का अपनी झेंप सहेजते हुए बोला,
“मेरा कमरा भी बहुत छोटा सा है। एक बिस्तर, चंद किताबें, एक मेज़, एक कुर्सी, कुछ बर्तन और मैं। बस अपनी सल्तनत में यही जागीर है।”
लड़के की इस बात पर लड़की खिलखिला दी
“वाह दोनों बातें एक साथ! वैसे छोटी ही सही, है तो आपकी सल्तनत ही राजा साहब। यह भी क्या कम है!”
लड़का चहक उठा।
“यक़ीनन! यह भी क्या कम है! और अब तो मल्लिका भी आई है सल्तनत में। बादशाही में कोई कमी नहीं रही।”
इस बार लड़की हँसी तो हँसती ही चली गई, इतना ज़्यादा कि आँखें नम हो उठी।
हकबकाया से लड़का बोला
“रुलाने का इरादा थोड़ी था! एक तो यार तुम्हारी यह अदा भी समझ नहीं आती! बहुत हँसती हो तो रोने लगती हो और फूट-फूटकर रोते हुए अचानक मुस्कुराने! मैं तो बहुत कंफ्यूज हो जाता हूँ।”
इस दफा़ भी लड़की भीगी आँखों से हँसने लगी।
सामने की कुर्सी से उठकर लड़का, पलंग पर बैठी लड़की के पास आ बैठा।
लड़की का हँसना और रोना दोनों रुक गया। वह एकटक लड़के को देखने लगी। लड़के के चेहरे पर बहुत सारे भाव आ जा रहे थे।
दोनों के बीच में से बहुत सारे पल लुढ़क पुड़क कर कमरे के फर्श पर बिखरने लगे, छपक-छपक कर कुछ कहते से।
भीतर भीतर भी कुछ उल्टा पुल्टा होने लगा। जब चटक-फटक बहुत बढ़ गई तो आखिर लड़के ने कह दिया,
“एक बार गले लगा लूँ?”

लड़की जवाब देने की बजाय खुद ही गले लग गई।

इतने साल गुज़र जाने के बाद लड़का कभी कभी अब भी मस्ती में लड़की से पूछ लेता है ,
“क्या एक बार तुम्हें गले लगा लूँ?”
हालाँकि यह पूछना, अब हमेशा गले लगाने के बाद ही होता है।
लड़की की आदत पर अब लड़के को भी लग चुकी है कि अब लौटते में लड़की के साथ-साथ लड़का भी नम आँखों से हँसता है और अक्सर हँसते-हँसते रोता है पर लड़की कभी नहीं
कहती कि मैं कंफ्यूज़ हो जाती हूँ।
प्रेम में आलिंगन यूँ भी मुकम्मल होते हैं।

सुषमा गुप्ता
सुप्रसिद्ध लेखिका, फरीदाबाद

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