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मुंबई में झूमा शब्द-सागर

राष्ट्रीय कवि संगम, हिंदी साहित्य भारती महिला प्रकोष्ठ तथा विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार, 17 नवम्बर 2025 को मुंबई प्रेस क्लब, आज़ाद मैदान में “अभिव्यक्ति के स्वर” राष्ट्रीय बहुभाषी कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। विभिन्न भाषाओं में गूँजती काव्यात्मक अभिव्यक्ति और भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने इस साहित्यिक संध्या को अविस्मरणीय बना दिया।

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दिल, दर्द और दमखम

यह ग़ज़ल इंसानी समझ, रिश्तों की पेचीदगियों, आत्मसम्मान और देशप्रेम के सूक्ष्म भावों को बेहद नफ़ासत से पिरोती है। कभी दुनिया की चालाकियों पर तीखा सवाल उठाती है, तो कभी अपने ही घावों को मरहम की तरह सँभाल लेने का सलीका दिखाती है। इश्क़ की कोमल धड़कनों से लेकर हमदम और रकीब की पहचान तक हर शेर एक अलग दुनिया खोलता है। अंतिम शेर ग़ज़ल को असाधारण ऊँचाई देता है, जहाँ धर्म से ऊपर उठकर वतन को सर्वोपरि माना गया है। यह सिर्फ शायरी नहीं, जीवन के अनुभवों की तराशी हुई सच्चाई है।

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डर नहीं, दहाड़

अनिता की यह कहानी एक सामान्य-सी नौकरी से शुरू होकर शक्ति, साहस और आत्मसम्मान की विस्फोटक लड़ाई में बदल जाती है। स्कूल डायरेक्टर की कुटिल नीयत, मानसिक खेल और डराने-धमकाने की हर कोशिश को ध्वस्त करते हुए अनिता जिस तरह अपने स्वाभिमान की रक्षा करती है, वह हर उस लड़की की आवाज बन जाती है जो कार्यस्थल पर चुपचाप अन्याय सहती है।

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मुकेश “कबीर” को मिला राष्ट्रीय कलम गौरव सम्मान

देश के सुप्रसिद्ध गीतकार और व्यंग्यकार मुकेश “कबीर” को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ, प्रयागराज द्वारा राष्ट्रीय कलम गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया।

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…कहीं आपको भी तो नहीं है फोन एडिक्शन

डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा बन चुका है, लेकिन सुविधा और मनोरंजन के बीच उसकी लत कब लग जाती है, कई बार हमें पता भी नहीं चलता। लंबे समय तक सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, नोटिफिकेशन के बारे में लगातार सोचना, फोन पास न होने पर बेचैनी ये सभी संकेत बताते हैं कि हमारा डिजिटल व्यवहार नियंत्रण से बाहर हो रहा है। समय रहते सीमाएँ तय करना और ऑफलाइन जीवन को महत्व देना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है।

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एक विरह ऐसा भी…

वियोग के उस क्षण में कवि को उसकी आँखों में प्रेम और आत्मीयता दोनों दिखाई देते हैं। बिछड़ते समय दोनों ने कुछ न कुछ खोया था. एक ने उदासी को सहा, दूसरे ने निश्चय को अपने होंठों पर थामे रखा। इस टूटते हुए रिश्ते के बीच भी कवि के भीतर एक मौन विश्वास जन्म लेता है कि प्रेम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

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बचपन

बचपन के वे सुनहरे दिन छोटी-छोटी खुशियों से भरे थे काग़ज़ की कश्तियाँ, बरसात की लहरें और मासूम शरारतें। पर समय बदल गया; तकनीक और प्रतिस्पर्धा ने सरल मनों पर बोझ डाल दिया। जहाँ बच्चों को खुलकर उड़ना चाहिए था, वहीं आज उनके आस-पास चिंता, दबाव और अनचाही समझदारी के पहरे खड़े हैं। फिर भी आशा यही है कि बचपन अपने स्वच्छंद पंखों से उड़ान भरे और माता-पिता का मार्गदर्शन उन्हें सही दिशा दे।

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आँखों में दर्द और मुस्कान लिए खड़ी लड़की, प्रेम और बिछड़ाव का पल

प्रेम का एहसास

प्रेम का पहला धुँधलका मैंने उसकी आँखों में देखा था वहाँ कोई असहज चाह नहीं, बल्कि एक ऐसी कोमलता थी जिसमें मेरा अस्तित्व अनायास घुलने लगता था। उस क्षण में प्रेम और देह, दोनों किसी पवित्र स्वीकृति की तरह एक-दूसरे में समा रहे थे।
मैंने महसूस किया था कि कुछ खोने की प्रक्रिया हम दोनों के भीतर एक साथ चल रही है अपने-अपने विश्वास, अपनी सुरक्षा, अपनी आदतें… मानो प्रेम हमें भीतर से उधेड़कर, नए रूप में बुन रहा हो।

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यक्ष प्रश्न

डॉक्टर की क्लीनिक में बैठकर हर बार वही विचार उमड़ते हैं—काश कुछ फैसले अलग लिए होते, कुछ कदम गलत न उठाए होते। कभी-कभी मन इतनी थकान से भर जाता है कि लगता है जैसे सन्त-महात्माओं जैसा शांत, संयमित जीवन ही समाधान हो। पर तभी खुद से सवाल उभरता है क्या वे भी कभी बीमारी से अछूते रहे होंगे? कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर न तो किसी किताब में मिलता है, न किसी प्रवचन में…..

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दास्तान ए जिंदगी

दास्तान-ए-ज़िंदगी” उस कहानी को बयां करती है जो काग़ज़ पर नहीं, आँखों की नमी में लिखी जाती है। जज़्बात कभी शब्द बनकर नहीं उतरते—वे खून की जुबान में अपनी दास्तान सुनाते हैं। चाँद को दिल में सँभाल कर रखने की मासूम हिदायत है, क्योंकि उसकी चाँदनी भी शरमाती है। रात की वीरानी, सूने सपने और ख़ामोश गलियाँ एक अकेलेपन का नक्श बनाती हैं। फिर भी किसी की मुस्कुराहट दिल की धड़कनों में रवानी भर देती है।

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