ऐसे न तुम रूठा करो
कुछ गिला कुछ बात कुछ शिकवा करो… जाने जां ऐसे न तुम रूठा करो।” तकरार और मोहब्बत के बीच झूलती यह पंक्तियाँ रिश्तों की उस नाज़ुक दूरी को छूती हैं जहाँ रूठना भी प्रेम का हिस्सा है।

कुछ गिला कुछ बात कुछ शिकवा करो… जाने जां ऐसे न तुम रूठा करो।” तकरार और मोहब्बत के बीच झूलती यह पंक्तियाँ रिश्तों की उस नाज़ुक दूरी को छूती हैं जहाँ रूठना भी प्रेम का हिस्सा है।
साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के अंतर्गत चार सृजन पीठ कार्यरत रहती हैं। इन चारों पीठ पर निदेशकों की नियुक्ति करते हुए प्रेमचंद सृजन पीठ पर उज्जैन के ही लेखक-व्यंगयकार मुकेश जोशी को निदेशक मनोनीत किया है। इस पद पर पिछले चार साल से अनीता पंवार पदस्थ रहीं लेकिन इन चार सालों में लगा ही नहीं कि इस पीठ की साहित्यिक गतिविधियों से कोई ताल्लुक भी है।
बाऊजी को रिटायर हुए पंद्रह साल बीत चुके थे। माँ के जाने के बाद उनकी दुनिया जैसे सूनी पड़ गई थी, इसलिए मैं उन्हें दिल्ली से मुंबई अपने पास ले आया। हर संभव सुविधा देने की कोशिश करता रहा दवाइयाँ, ताज़ा फल, सुख-सुविधाएँ पर बाऊजी का मन हमेशा उसी पुराने घर में अटका रहता जहाँ माँ की यादें थीं। एक सुबह दूध की एक गिलास ने सब कुछ उजागर कर दिया. दूध में पानी, और मेरे हिस्से में शुद्ध दूध। पापा के सामने मेरा सिर झुक गया। उन्होंने बात को हँसकर टाल दिया, पर उनके स्वर की कंपकंपाहट मेरे मन पर चुभ गई।
भीड़भाड़ वाले मॉल में ट्रॉली पकड़े खड़ी थी वह हमेशा की तरह दूसरों के लिए तरह-तरह की चीजें खरीदकर। बेटे की मासूम-पर-सीधी बात ने दिल में जैसे किसी ने सच का आईना रख दिया. “मम्मी, आपने अपने लिए क्या खरीदा?” वक्त जैसे ठहर गया। कितने सालों से वह अपने लिए कुछ चाहने तक की हिम्मत नहीं कर पाई थी। सबके लिए जीते–जीते वह खुद से कितनी दूर चली गई थी, आज बेटे ने वही याद दिला दिया।
कई वर्षों तक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी मेरी पढ़ाई की इच्छा आज फिर से सिर उठाने लगी है। उम्र पचास पार कर चुकी है, पर मन में अभी भी उम्मीद की लौ जल रही है। कभी मेधावी छात्रा रही मैं, जीवन की उलझनों में खुद को कहीं खो बैठी थी। कर्तव्य और परिवार ने हमेशा पहला स्थान पाया, और मेरी इच्छाएँ पीछे छूटती गईं।
रात की नीरवता में मन बार-बार किसी अज्ञात उपस्थिति को महसूस करता है. जैसे कोई अदृश्य कदमों से मन के आँगन तक आ पहुँचा हो। पहचान स्पष्ट नहीं, पर एहसास गहरा है। कोई है… जिसकी आहट, जिसकी परछाईं, जिसकी अनकही मौजूदगी दिल को बेचैन भी करती है और आकर्षित भी। मन बार-बार उसी ओर खिंचता है.
मतलबी रिश्ते अक्सर शुरुआत में बहुत मीठे लगते हैं, लेकिन समय के साथ उनकी परतें उतरने लगती हैं। लोग साथ तो देते हैं, लेकिन उनके कदमों के पीछे सुविधा छिपी होती है। वे मुस्कुराते ज़रूर हैं, पर मुस्कान में अपनापन नहीं. ज़रूरतों की परछाई बसती है। जब तक आप उनके काम आते हैं, वे आपके साथ रहते हैं; और जिस दिन आपका उपयोग समाप्त होता है, दूरी बढ़ने लगती है। ऐसे रिश्ते दिल तोड़ते हैं, लेकिन आँखें खोलना भी सिखाते हैं क्योंकि सच्चे लोग कम होते हैं, और वही जीवन के सबसे सुंदर किनारे होते हैं।
जीवन को रंगों ने हमेशा ही नए अर्थ और नई दिशा दी है। लाल रंग माँ की बिंदी की तरह स्नेह और खुशियों का संदेश देता है, हरा रंग धरती की हरियाली बनकर मन में शीतलता और समृद्धि का भाव जगाता है। नीला रंग आसमान की तरह मन को उड़ान और शांति दोनों देना जानता है, जबकि सफ़ेद रंग सरस्वती की पवित्रता में ज्ञान और सादगी का प्रतीक बन जाता है। भगवा रंग सनातन संस्कृति की जड़ से जोड़कर जीवन में अनुशासन और संस्कारों का उजास भरता है। हर रंग अपनी अलग महिमा लिए हुए है और हर रंग जीवन को किसी न किसी रूप में सम्पन्न और सार्थक बनाता है।
बचपन वह उम्र है, जब दुनिया का कोई ग़म साथ नहीं चलता। मासूमियत इतनी गहरी होती है कि हर डाँट भी प्यार लगती है और हर शरारत में एक बेफ़िक्री छुपी रहती है। बच्चे न गीत के सुर जानते हैं, न जिंदगी की डर-फिक्र फिर भी सबसे मधुर धुन वही गा लेते हैं। किसी पत्थर को उछालते हुए भी हँस देना, किसी अजनबी से भी अपना-सा रिश्ता बना लेना, यही उनकी अलमस्त दुनिया का जादू है।
वो दिन कितने सुहाने थे. जब तुम छोटे-से बच्चे थे। खेलते–कूदते हुए हँसते-हँसते मेरी गोदी में चढ़ आते और मिट्टी में खेलकर अपने गालों पर रंग-सा बिखेर लेते। तुम्हारी वह मुस्कान मानो चारों ओर गुलाल-सी छा जाती। मैं तुम्हें गले लगाकर झूला झुलाती, और तुम्हारे लाड़-प्यार से घर में मानो खुशियों के मोती बिखर जाते। दौड़ते-दौड़ते जब तुम थककर मेरी बाँहों में सो जाते, तो लगता जैसे दुनिया की सारी शांति मुझे मिल गई हो।