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“टीआरपी, दबाव और सच

राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर इंदौर में एक अनोखा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें पहली बार शहर के आम लोगों ने पत्रकारों से सीधे सवाल पूछे। सवाल पुछने वालों की जिज्ञासा थी कि क्या मैनेजमेंट का दबाव रहता है? क्या किसी पार्टी-नेता विशेष के पक्ष में खबरों को लेकर निर्देश रहते हैं? हर दिन के काम में अन्य अखबारों से कैसी प्रतिस्पर्धा रहती है? नेगेटिव खबरों के साथ पॉजिटिव खबरों के बीच तालमेल कैसे बैठाते हैं।

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पहचान लिखो…

एक उम्र-दराज़ औरत अपने वजूद की दास्तान खुद नहीं. उस नज़र से लिखवाना चाहती है जो उसे सच में समझती है। दुनिया ने उसे अपने पैमानों से तौला, पर वह बस इतना चाहती है कि कोई उसे “इंसान” की तरह लिखे।

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मूक प्यार…

मैले कपड़ों में कमल-सी खिलती वह गूंगी-बहरी लड़की हर रोज़ उसे निहारती थी। वह समझ नहीं पाता कि वह उससे क्या चाहती है, जब तक कि एक दिन उसके मांग भरने के इशारे ने मूक प्रेम का गहरा अर्थ खोल नहीं दिया।

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मेरा श्रृंगार

यह कविता उस प्रेम की है जहाँ साथी केवल जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन का श्रृंगार बन जाता है। मेंहदी की खुशबू, चूड़ियों की खनक और पायल की रुनझुन सब उसी के स्पर्श से अर्थ पाते हैं। सुख–दुख में साथ निभाने वाले प्रेम के उस रूप को यह पंक्तियाँ समर्पित हैं, जो मोह-माया से परे होकर भी दिल पर अपना गहरा रंग छोड़ जाता है. जैसे आत्मा का श्रृंगार।

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शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…

एक संयोग-भरी ट्रेन यात्रा में सामने बैठी एक सभ्रांत, गुमसुम महिला ने लेखक की आत्मा को अनकहे शब्दों से छू लिया। उसकी उदास आँखों में जैसे कई अनलिखी कहानियाँ थीं, और उसकी खामोश मुस्कान में छिपे इंद्रधनुषी रंग बार-बार पुकारते थे। दो मुसाफ़िर कुछ पल साथ, फिर अपने-अपने स्टेशनों की ओर। समय बीत गया, उम्र बढ़ी, लेकिन उस अनाम उदासी भरे चेहरे की याद दिल की तहों में आज भी महफ़ूज़ है।

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चूरन वाली चाची

विद्यालय के बाहर छोटी-सी दुकान लगाए बैठी चूरन वाली चाची जी बचपन की सबसे मीठी यादों में से एक हैं। झरबेरी के रंग-बिरंगे बेर, गुड़ वाली लाल इमली, संतरे वाला कम्पट और नमक लगा कमर उनका हर स्वाद मानो बचपन की जेब में छुपी खुशी जैसा। न दिखावा, न चालाकी बस सादगी, अपनापन और शुद्ध स्वाद का भरोसा। सच में, पूरे दिल से भोली-भाली थीं चूरन वाली चाची जी।

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आँखों की ख़ामोशी

इन आँखों की ख़ामोशी में एक दबी हुई रागिनी है अनकहे शब्दों की, आधी छूटी कहानियों की। चेहरे पर ठहरी शांति और निगाहों में उठते-गिरते समंदर के बीच एक गहरा मंथन छुपा है। ये आँखें जैसे हर सवाल का जवाब अपने भीतर समेटे बैठी हों, मानो कह रही हों कि उन्होंने बहुत कुछ देखा है… पर कहने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।

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छुपते हुए ख्वाब…

आधी रात की खामोशी में बंद खिड़की से झाँकती रोशनी और दिल की अनकही बातों के बीच जन्म लेती है यह कविता। कहीं स्पर्श की हल्की-सी सिहरन है, तो कहीं यमुना तट की लहरों संग खेलती मासूमियत। बाग-बगीचों से लेकर तारों भरी रात तक कवि का मन बार-बार उसी भटकते, अविरल प्रेम की ओर लौटता है, जिसे कहने की चाह तो है, पर कह न पाने की झिझक भी उतनी ही गहरी।

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आचरण

शहर के प्रतिष्ठित लोगों के बीच आयोजित परिचर्चा अचानक गरमा गई। विषय था “जीवन में शिष्ट आचरण का महत्व”, पर अतिथि आपसी आरोप–प्रत्यारोप में इतने उलझे कि बहस व्यक्तिगत हमलों में बदल गई। मंच का सम्मान दांव पर लग गया और आयोजक शांति बहाल करने की कोशिश करते रहे। विडंबना यह कि शिष्ट आचरण पर चर्चा करने आए लोग स्वयं ही उसका पालन करना भूल गए।

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