
रेणु परसरामपुरिया, लेखिका, मुंबई
आँखें नम हैं…. भावनाओं का उद्वेग थमने का नाम नहीं ले रहा….डर, संकोच, संशय के साथ ही खुशी, संतुष्टि, जिज्ञासा….इतनी सारी भावनाएँ एक छोटे-से दिल में उमड़-घुमड़ रही हैं कि क्या ही बताऊँ।
बहुत सालों से बस इस एक कदम के चलने की हिम्मत जुटा रही थी, पर हर बार ज़िम्मेदारियों का बोझ मेरे कदम पीछे खींच लेता था। पारिवारिक उत्तरदायित्व और अपनी इच्छा को जब भी तराजू में तौला, मैंने हमेशा कर्तव्य का पलड़ा ही भारी पाया। शायद बचपन से संस्कार ही ऐसे मिले थे।
बचपन से ही मैं मेधावी छात्रा रही। पहली कक्षा से दसवीं तक और कॉलेज में भी प्रथम स्थान प्राप्त करने का कीर्तिमान मेरे नाम रहा। आगे पढ़ना चाहती थी। ऐसा नहीं कि माँ–पिताजी लड़कियों की पढ़ाई के खिलाफ थे. अपने बेटियों के रिपोर्ट कार्ड देखकर बहुत खुश होते थे. पर वे इतने आधुनिक भी नहीं थे कि सामाजिक मानदंडों के विरुद्ध जाकर बेटियों को खूब पढ़ाएँ और उन्हें अपने हिसाब से जीवन जीने का अधिकार दें। बस, उसी की कीमत मैंने चुकाई.ससुराल आ गई।
और फिर वही हुआ जो अक्सर एक लड़की के साथ होता है. इच्छाओं का दमन। किताबें भूलकर रसोई को अपना लिया। ससुराल वालों को खुश करने में दिन–रात एक कर दिया, पर सफलता हाथ न लगी। जो लड़की पढ़ाई में सबको पीछे छोड़ देती थी, वही ससुराल आकर पिछड़ने लगी। आत्मविश्वास डगमगाने लगा। जितनी कोशिश करती, उतना ही पीछे खींच दी जाती। अंततः एक दिन मैंने अपनी कोशिशों पर विराम लगा दिया।
उन्हीं दिनों एक सहेली से मुलाक़ात हुई.मेरी ही हमउम्र। बातों-बातों में पता चला कि उसने आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में दाखिला लिया है। सुनते ही मेरी आँखें चमक उठीं.अरे! मैं भी तो यही चाहती थी। मैं तो अपनी इस चाहत को भूल ही गई थी।
मन में हज़ार सवाल उठने लगे.क्या मैं अब पढ़ पाऊँगी?
सहेली ने हिम्मत दी“क्यों नहीं? जब मैं कर सकती हूँ तो तुम क्यों नहीं?”
बात सही थी। पर मन सवालों की मैराथन दौड़ रहा था.पचास साल से अधिक उम्र, याददाश्त पहले जैसी नहीं, एकाग्रता कम, शारीरिक परेशानियाँ, जवान बच्चों के साथ कॉलेज जाना, क्लास में बैठना. कई शंकाएँ थीं। फिर भी दिल में दबी इच्छा ज़ोर पकड़ने लगी।
सोचा, घर में बात करूँ। बच्चों और पति ने बहुत हौसला बढ़ाया।
उसी समय बड़ी बेटी की शादी की बात शुरू हो गई। फिर एक बार ज़िम्मेदारी का पलड़ा भारी पड़ गया। बेटी की शादी मेरी पढ़ाई से अधिक महत्वपूर्ण लगी। मैंने बेटी को खूब पढ़ाया ताकि उसे जीवन में किसी बात का मलाल न रहे। सही वर ढूँढते-ढूँढते काफ़ी समय निकल गया।
वह ज़िम्मेदारी भी पूरी हुई। फिर लगा अब यही सही समय है। और मैंने कॉलेज में दाखिला ले लिया। आज ही सारी औपचारिकताएँ पूरी करके आई हूँ।
खुश तो हूँ, पर थोड़ा डर भी लग रहा है. कैसे करूँगी? कर भी पाऊँगी या नहीं?
ख़ैर, इन सवालों के जवाब तो समय ही देगा। पर इतना तय है कि अपनी इस नई यात्रा में मुझे आनंद बहुत आएगा।

Bahut badhiya …padhai ki koi umar nahi hoti
अत्यंत श्रेष्ठ लिखावट💯
Bahut khoob❤️