चाहत
कई वर्षों तक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी मेरी पढ़ाई की इच्छा आज फिर से सिर उठाने लगी है। उम्र पचास पार कर चुकी है, पर मन में अभी भी उम्मीद की लौ जल रही है। कभी मेधावी छात्रा रही मैं, जीवन की उलझनों में खुद को कहीं खो बैठी थी। कर्तव्य और परिवार ने हमेशा पहला स्थान पाया, और मेरी इच्छाएँ पीछे छूटती गईं।
