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स्त्री

स्त्री, हर ताले की चाबी अपने पास रखती है। घर के हर कोने में, हर रिश्ते में, वह सबकी ज़रूरतों और सपनों के ताले बड़ी आसानी से खोल लेती है। लेकिन विडंबना यह है कि उसके पास कभी अपनी ही मनमर्ज़ी की चाबी नहीं होती। दूसरों के लिए खुली हुई दुनिया के बीच, उसके अपने इच्छाओं का द्वार अकसर बंद रह जाता है।

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मतदाता जागरुकता के लिए कांग्रेस ने निकाली प्रभात फेरी

महिदपुर विधानसभा क्षेत्र के महिदपुर रोड में गुरुवार को कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा मतदाता जागरूकता अभियान के अंतर्गत प्रभात फेरी निकाली गई. इस अवसर पर कार्यकर्ताओं ने लोगों से अपने नाम मतदाता सूची में जुड़वाने और मतदान के प्रति सजग रहने का आह्वान किया. कार्यक्रम का नेतृत्व विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेश परमार और महिदपुर विधानसभा के विधायक दिनेशचंद्र बोस ने किया.

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ये रेशमी जुल्फें

गाँव की गलियों में आजकल एक नई आवाज़ गूंजने लगी है. “माथा का बाल ले लो… पाँच हज़ार रुपए किलो!” पहली बार सुनने पर यह बात उतनी ही लुभावनी लगती है जितनी किसी मेले में सोने के दाम में चाँदी बेचने की। लेकिन सच्चाई कुछ और है .यह नया “धंधा” ग्रामीण महिलाओं की भोली मानसिकता और शहरी उद्योगों की चालाकी का संगम है।
गिरते बाल अब चिंता का नहीं, कमाई का विषय बन गए हैं। महिलाएँ इन्हें संभालकर रखती हैं, ताकि अगले महीने फेरीवाले से कुछ रुपये या सस्ता सामान पा सकें। पर असल में वे जिस चीज़ का सौदा कर रही हैं, वह उनका सौंदर्य और समझ दोनों हैं।ये बाल आगे चलकर विग, कॉस्मेटिक और विदेशी बाजारों में करोड़ों की कीमत पा जाते हैं।
सवाल यही है क्या हम सच में “बालों को बचा रहे हैं” या “अपनी समझ खो रहे हैं”?

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टूटना एक डाल का…

जीवन की आंधियाँ जब चलती हैं, तो सिर्फ डालियाँ ही नहीं, कई बार इंसान भी टूट जाते हैं . अपने ही सदाचार और शुभ कर्मों के बोझ से। इस टूटने में भी एक सच्चाई है जैसे परिंदों के घोंसले बिखर जाते हैं, पर वे नई जगह फिर से घर बना लेते हैं। कोयल की तान कहीं खो जाती है, मगर उसकी खोज जारी रहती है। यही जीवन का शाश्वत चक्र है . गिरना, बिखरना और फिर उठना।

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ऑनलाइन की हरी बत्ती..

हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।

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प्रेम और नफ़रत

प्रेम वह शक्ति है जो जीवन को जोड़ती है और नफ़रत वह आग है जो उसे भस्म कर देती है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मुस्कान होती है; जहाँ नफ़रत होती है, वहाँ विनाश। इसलिए प्रेम बाँटिए, नफ़रत छोड़िए क्योंकि प्रेम ही सच्ची मानवता है।

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संदेह और संबंध…

संदेह हर बार अविश्वास से नहीं, बल्कि संवाद की कमी से जन्म लेता है। जब शब्द थक जाते हैं और मौन लंबा हो जाता है, तब मन कल्पनाओं से भर जाता है। पर यदि हम सच से संवाद करें, तो संदेह भी संबंध को सुधारने का अवसर बन सकता है। क्योंकि प्रेम का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि समझ और सच्चाई में विश्वास है।

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गठरी…

उसने आवाज दी, और मैं चल पड़ी—अपनी भावनाओं की गठरी उठाए हुए। पास पहुंचने पर जाना कि उसके मन की हर गली कितनी सँकरी है, हर कोना कितना सीमित। उन सँकरी गलियों में चलते-चलते मैं खुद भी सिकुड़ गई। चारों ओर अँधेरा था, और मैं उसी अँधेरे में भटकती हुई आखिरकार उसके पास पहुँची। वह वहाँ था. खुश, बेफिक्र और अपने आप में मशगूल। न उसे मेरा इंतज़ार था, न मेरी कोई ज़रूरत। तब एहसास हुआ जहाँ ज़रूरत नहीं, वहाँ ठहरना नहीं चाहिए। मगर लौटने का रास्ता तो मैं भूल चुकी थी। अब वही सवाल मन में गूंजता है मैं क्या करूँ? इस भावनाओं की गठरी का बोझ कैसे उठाऊँ?

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सच या मान्यता ?

हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही देखने और मानने लगते हैं। यही प्रवृत्ति “कंफर्मेशन बॉयस” कहलाती है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो, हमारा दिमाग उसे उसी रूप में देखना चाहता है जैसा हम मानते हैं। यही कारण है कि किसी व्यक्ति, विचार या विचारधारा से जुड़ने के बाद हम उसकी गलतियाँ भी नजरअंदाज कर देते हैं। असल में दिक्कत सच्चाई में नहीं होती दिक्कत हमारे देखने के “चश्मे” में होती है। कई बार दाग हकीकत में नहीं, चश्मे पर ही होते हैं।

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केसी कॉलेज का इंटर कॉलेजिएट फेस्ट “किरण” 13 से

-किशनचंद चेल्लाराम (केसी) कॉलेज का प्रतिष्ठित इंटर कॉलेजिएट फेस्ट किरण सिर्फ एक फेस्ट नहीं रह गया है, बल्कि अपने समय की एक ऐसी उत्कृष्ट सांस्कृतिक प्रस्तुति बन चुका है, जिसे हर वर्ष विद्यार्थी, शिक्षक और प्रतिभागी लंबे समय तक याद रखते हैं. एन.एच.एस.आर.ई. की डायरेक्टर और एचएसएनसी यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर कर्नल प्रो. डॉ. हेमलता बागला ने कहा कि हर तरफ त्यौहारों का माहौल है,

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