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पानी की अपनी मर्जी है साहब…

पानी ठंडा हो तो जमा कर दे, गर्म हो तो जला दे।
ज़्यादा हो तो डुबो दे, कम हो तो प्यास से मार दे।
मैला हो तो बीमारी दे, आँखों में हो तो आँसू बन ए,
और शरीर से बहे तो मेहनत की बूंद कहलाए।

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अम्माजी…

जयपुर में किराये के घर के नीचे रहने वाली 80-85 साल की अम्माजी ने मुझे दोस्त बना लिया था। हिसाब-किताब में पक्की, आवाज़ में रौब — और उम्र में अद्भुत ताक़त। बेटियाँ पास थीं, बेटा विदेश में पर उनके मन में सबसे बड़ी खाली जगह बेटे ने ही छोड़ी थी। वह मुझे बहाने से बुलातीं, गाने सुनातीं, और कहतीं “बात कर लिया करो, अच्छा लगता है।”
दिवाली से ठीक पहले वह बाथरूम में गिर गईं। ऑपरेशन हुआ। बेटियाँ दौड़-भाग में, और एक्सरसाइज़ मेरा काम। irritation भी होती थी, पर उनसे मोह भी हो गया।

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मुद्दों की बात हम करते नहीं…

हम इस देश में असल मुद्दों पर बात करना पसंद नहीं करते। हमें झंझट पसंद नहीं, इसलिए टूटी सड़कों, मिलावट वाले खाने, बढ़ते कंक्रीट, बिजली-पानी की किल्लत तक सब सहते जाते हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ती रहे, पर्चे बिकते रहें, कूड़े के पहाड़ बन जाएँ फिर भी फर्क नहीं पड़ता। हम तमाशा देखते रहते हैं। असल में हमें मुद्दे नहीं, आराम चाहिए। यही वजह है कि हालात बदलते नहीं और हम भी नहीं।

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देह की देहरी से परे

ह की देहरी लांघकर तुम कभी मुझ तक नहीं आ पाओगे। मैं केवल बाहर से दिखाई देने वाला शरीर नहीं हूँ, मैं सिर से पाँव तक, बाहर से भीतर तक सम्पूर्ण हृदयवत हूँ। इस शरीर के खोल की दीवारें मैंने कछुए जैसी मजबूत बनाई हैं। यह बदन भोग्य नहीं, यह एक मंदिर है, जिसमें मैंने स्वयं की प्रतिमा स्थापित की है और उस द्वार की प्रहरी मैं स्वयं हूँ।

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वजूद की छैनी

माँ होना जैसे मेरा सबसे बड़ा अपराध बन गया। हर कोई मेरे किरदार को अपनी-अपनी सुविधानुसार तराशता रहा। किसी ने कभी नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूँ .क्या चाह कर जियूँ, कैसे जीना चाहूँ। सबने सिर्फ़ अपने अपने फैसले मेरे ऊपर रख दिए। सवाल, ताने, धारदार जजमेंट सब मुझ पर ही बरसते रहे। मेरी अपनी छोटी-सी चाहत, अपनी-सी ज़िंदगी… कब छूट गई, मुझे याद भी नहीं। बस इतना समझ आया है कि मैं कहीं रास्ते में ही पीछे रह गई और “मैं” का वो छोटा-सा किस्सा, बहुत पहले तमाम हो चुका है।

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सुनहरा छाता

किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहती थी। किसे बताती? कौन सुनता? आँसू तो पहले ही सूख चुके थे। वो बस उस सुनहरे छाते को देखती आगे बढ़ रही थी। शायद उसी छाते के नीचे थोड़ी गुनगुनी धूप मिले… बिना रोक-टोक… बिना बाँधन।
पर तभी एक चीख गूँजी। लोग भागकर इकट्ठे हुए। सायरन बजाती एम्बुलेंस आई और एक शरीर उठा ले गई। इस घर में उसी घर में जिसके लिए उसने अपना मायका छोड़ा… खून के रिश्ते छोड़े बस सन्नाटा फैल गया। राकेश काला चश्मा लगाकर आया और बस इतना कहा “सब ख़त्म हो गया।”

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मैं ही ज्योति, मैं ही अनंत

जिसे तुम बाहर ढूँढते फिर रहे हो, वह सब तुम्हारे भीतर है। धरती के छोर से लेकर आकाशगंगाओं के पार तक, जो भी दिखाई देता है, वह उसी एक ऊर्जा की भिन्न–भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। सूर्य की गर्मी, चाँद की शीतलता, समुद्र की गहराई, हिमालय का शौर्य, गंगा की पवित्र धार सब उसी शक्ति के रूप हैं। वह शक्ति न किसी दिशा में सीमित है, न किसी समय में बँधी। वह अनंत है और सर्वव्यापी है। भगवा इसी अनंत प्रकाश का प्रतीक है .जो न कहीं शुरू होता है और न कहीं समाप्त।
जो इसे पा लेता है — वह समझ जाता है कि खोज बाहर नहीं, भीतर की ओर मुड़ने में है।
सब उसी से जन्मा है और अंततः उसी में विलीन होना है।

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ये क्या हुआ

यह कविता उस कटु सच्चाई पर चोट करती है, जहाँ विचार और कलम दोनों की नीलामी होने लगी है। जहाँ डर और लालच ने उन लोगों को भी झुका दिया, जो कभी सिद्धांतों के आसमान हुआ करते थे। आज हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सच बोलने वाले लोग ही गायब हो गए हैं और जिन्हें समाज की आत्मा माना जाता था, वही बिक चुके हैं। अब सवाल सिर्फ़ यही है ये सिलिसिला किसने शुरू किया? और कब तक चलता रहेगा?

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होशियार मां

सरला को यक़ीन था कि उसकी बहू उसकी सहेली बनेगी। पर शादी के बाद कहानी कुछ और ही निकली। रिश्ते की शुरुआत से ही अमीषा के नख़रे और लालच से अमित टूटने लगा। जब उसने पैसों और ज़मीन की माँग की तो सरला को समझ आ गया — बात सिर्फ़ ईगो या गलतफ़हमी की नहीं, लोभ की थी। बेटे को बचाने के लिए उसने शांति से, लेकिन चतुराई से उस सच को रिकॉर्ड कर लिया — जिस पर अमीषा को हमेशा भरोसा था कि कोई पकड़ नहीं पाएगा।कोर्ट में सच्चाई का वीडियो जैसे ही सामने आया सबकी स्थिति पलट गई।

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ओ पारिजात

रात गहरी हो रही है और हवा में पारिजात की सुगंध घुल रही है। मैं जागता हूँ और कविताएँ लिखता हूँ, पर शब्द अब इस खुशबू में मदहोश होने लगे हैं। मैं रंगों की सुंदरता नहीं चाहता .मुझे तो प्रेम का वही लाल रंग चाहिए जो आत्मा को महका दे। मैं चाहता हूँ कि मैं पारिजात के आँगन की उसी मिट्टी में बो दिया जाऊँ, और वहीं लगातार महकता रहूँ। इस सिंदूरी भोर में, एक स्पर्श भर से मेरी कविता फिर जीवित हो उठी है।

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