भरोसे की नैया
“जब प्रभु सारथी बनकर साथ चलते हैं, मन बेफ़िक्र हो जीवन की हर राह पार कर लेता है। कृपा की पतवार और विश्वास की डोर यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।”

“जब प्रभु सारथी बनकर साथ चलते हैं, मन बेफ़िक्र हो जीवन की हर राह पार कर लेता है। कृपा की पतवार और विश्वास की डोर यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।”
कभी-कभी एक शब्द चुभ जाता है और दिल-दिमाग़ उलझ जाते हैं। लेकिन जब हम खुद को सामने वाले की जगह रखकर देखते हैं, तो समझ आता है कि क्रोध विवेक छीन लेता है और मन को भटका देता है। मानव बने रहने के लिए मन-मानस का तालमेल जरूरी है।
पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।
अपने माता-पिता को आग में खोने के बाद अरुण बिल्कुल अकेला रह गया। एक साड़ी की दुकान में काम करते हुए उसने चोरी रोककर अपने मालिक का विश्वास जीत लिया। मालिक ने उसकी ईमानदारी देखकर उसे अपनी बेटी निशा के साथ विवाह के लिए कहा। किस्मत से उजड़ा अरुण का घर फिर से बस गया, और तीनों एक खुशहाल परिवार बन गए।
84 साल की उम्र में 16वीं मंज़िल से छलांग लगाकर आत्महत्या इस घटना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। उम्रभर की लड़ाइयाँ जीतने वाला इंसान अंतिम पड़ाव पर इतना टूट जाता है कि जीवन ही बोझ बन जाए, यह हमारे समाज और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
सर्दियों की परतों में लिपटा एक आदमी, और उसी सड़क पर नंगे पाँव खड़ा एक बच्चा हितेश। कुछ ही सवालों में उसकी पूरी दुनिया खुल जाती है: शराब में डूबे पिता, रजाइयाँ बेचती माँ, स्कूल से कोसों दूर सपने, और नीम के नीचे गुज़ारी हर रात। ठिठुरन उस बच्चे की नहीं, उस आदमी की आत्मा में घुसती है, जो अपनी जैकेट उतारकर भी खुद को नग्न महसूस करता है। हितेश की मासूमियत जैकेट पर डियो छिड़ककर “आपसे बदबू नहीं आएगी” कहना उसकी गरीबी से कहीं ज़्यादा क्रूर है।
कहते हैं कि कलियुग आ चुका है, लेकिन अब लगता है कि वह चारों दिशाओं में फैलकर मनुष्य के भीतर गहराई तक उतर चुका है। रिश्तों में विष घुल गया है भाई भाई का नहीं रहा, माँ घर की देहरी से बाहर धकेल दी गई, और धन ही सम्मान का नया मापदंड बन गया। समाज में भय, हिंसा, लोभ और छल ऐसी सहजता से घुलमिल गए हैं कि कोई उन्हें असामान्य भी नहीं मानता। प्रकृति भी जैसे मनुष्यों के पापों की साक्षी बनकर अपना क्रोध दिखा रही है नदियाँ मार्ग बदल रही हैं, वर्षा अनियंत्रित हो रही है और जीवन असुरक्षा में डूबता जा रहा है।
महेश चार साल बाद घर लौटा था. सिर्फ राखी के लिए, और शायद इसलिए भी कि ज़िंदगी उसे एक मोड़ पर ले आई थी। उसके साथ थी भवानी एक आत्मविश्वासी, पढ़ी-लिखी और दृढ़ स्वभाव वाली स्त्री, जिसने घर की दहलीज़ पर कदम रखते ही सभी पुराने समीकरण बदल दिए। पिता की कटु टिप्पणियाँ, चाचा की चालें, और परिवार का दोगलापन सब उसकी शांत मुस्कान और सधे हुए शब्दों के आगे फीके पड़ने लगे। बहनें, जिनके लिए महेश ने जीवन खपा दिया, पहली बार किसी बाहरी से अपार स्नेह महसूस कर रही थीं। तीन दिनों ने वर्षों पुरानी दूरी को उधेड़कर रख दिया