कलियुग

हेमा जोशी “स्वाति” लोहाघाट, उत्तराखंड

कलियुग बड़ा भयंकर आया,
छल–प्रपंच की विद्या लाया।
झूठा भोजन, झूठी बानी
इनका नहीं है कोई सानी।

वैर करें अब भाई से भाई,
वृद्धाश्रम छोड़ें हैं माई।
पाल–पोस कर बड़ा किया था,
माँ से बढ़कर बनी लुगाई।

पाप–अधर्म बढ़े हैं जग में,
स्वार्थ परक हुए नर–नारी।
दीन–हीन पूछे नहीं कोई,
धनवानों का मान है भारी।

चोर–लुटेरे चोरी करके
हिंसात्मक मारग अपनाते।
भयहीन घूमें समाज भीतर,
इनसे सब जन खौफ हैं खाते।

कहीं नहीं समरसता दिखती,
पतन हुआ समाज का भारी।
व्यावहारिकता शून्य पड़ी है
बढ़ती जाती यह दुश्वारी।

व्यवहार अनैतिक हो चला जग,
संतोष विहीन हुए प्राणी।
बेमानी व्यभिचार बढ़ा है,
कलहपूर्ण हो गई है वाणी।

हो रही बेमौसम वर्षा,
प्राकृतिक आपदा लाती।
चलते–चलते मार्ग बदलकर
नदियाँ घर–द्वार बहा ले जाती।

इच्छा–पूर्ति करें हर कोई,
धर्म–कर्म का ज्ञान नहीं है।
नास्तिकता चहुँ ओर बढ़ी है,
भक्ति–भाव का मान नहीं है।

छाया भौतिकवाद यहाँ पर,
संस्कृति अपनी भूल गए हैं।
सत्य–न्याय सब गौण हो चले,
धनबल पर ही टिके हुए हैं।

एक विशेषता कलियुग की
समझें जब हम आप।
भक्ति–मार्ग पर जो चलते,
कट जाते उनके सब पाप।

अहंकार और क्रोध तजें,
स्मरण करें भगवान
उद्धार उन्हीं का हो सके,
कलियुग में यह जान।

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