पीर की नदी

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद

बहुत देर तक जंगल में भटकने के बाद कृष एक मनोरम स्थान पर पहुँचा। झरने की कल-कल उसके भीतर की थकान और शोर को शांत करने लगी। वह वहीं बैठ गया। तभी उसकी नजर ऊपर चट्टान पर गई, जहाँ एक महिला आकृति नीचे की ओर झुकती दिखाई दी। पता नहीं क्या सोचकर वह तुरंत उठकर भागते हुए उस चट्टान पर पहुँच गया। उसकी सांसें तेज हो गई थीं, पर अकेलेपन की उदासी कुछ कम लगने लगी थी।

नज़दीक पहुँचकर उसने देखा-वह एक पहाड़ी औरत थी, जिसकी आँखों में उसे अपनी ही पीड़ा की परछाई दिखाई दी।

“…तुम यहाँ क्या कर रही हो…?”

वह कुछ कहने लगी, पर कृष समझ नहीं पाया। वह रोते हुए आसमान की तरफ देखकर कुछ बोल रही थी. एक ऐसी भाषा में जिसे वह जानता नहीं था। अजनबी बोली उसके पल्ले नहीं पड़ी, पर इतना वह समझ गया कि वह भी उसी दर्द से गुजर रही है, जिससे होकर वह यहाँ तक पहुँचा है।

वह इशारों में काफी देर तक अपनी बात समझाती रही। कृष उसे देखता रहा और उसके माध्यम से अपनी ही पीड़ा को सुनता रहा। कभी-कभी अपनों से मिली चोट हम किसी को बता नहीं पाते। जान से प्यारी पत्नी की बेवफाई के लिए उसके पास भी कोई शब्द नहीं थे। दर्द को कोई बिना कहे समझ ले. यह हम चाहते तो हैं, पर होता कहाँ है? मगर इस वक्त वही हो रहा था।

वह पीड़ा, जो इतने दिनों से कृष के दिल में मूक चीख बनकर तड़प रही थी, आज किसी निनाद की तरह गूंजने लगी। उसने भी अपनी भाषा में बोलना शुरू किया। बोलते ही उसे हल्कापन महसूस होने लगा। दोनों इसी क्रम में कुछ देर तक अपनी-अपनी पीड़ा उँडेलते रहे।

कुछ घंटे बाद दोनों ही खामोश हो गए और हल्के भी। दिल पर रखी दर्द की भारी शिला पिघलकर बह चुकी थी। पहली बार उसे लगा कि पीड़ा को समझने के लिए किसी भाषा या शब्द की जरूरत नहीं। पीर हमेशा गूंगी होती है, जो हर अंग से गूंजती रहती है।

मेरी आँखों की पीर की नदी
उसकी आँखों से जा मिली
भावनाएँ दोनों की
बिना पतवार के बह चली।

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