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जंगल में झरने के पास बैठे एक युवक और चट्टान पर खड़ी पहाड़ी महिला, दोनों के चेहरों पर गहरा दर्द और भावनात्मक जुड़ाव

पीर की नदी

बहुत देर तक जंगल में भटके कृष की थकान झरने की कल-कल में घुलने लगी। तभी चट्टान पर झुकी एक पहाड़ी औरत दिखी। उसकी आँखों की पीड़ा कृष को अपनी लग रही थी। वे दोनों अलग भाषाएँ बोलते थे, पर दर्द की भाषा एक थी। इशारों और टूटे शब्दों के बीच दोनों अपनी-अपनी चुप चीखें उँडेलते रहे। वह भार, जो दिलों पर चट्टान बना बैठा था, धीरे-धीरे पिघलता चला गया। उस पल उन्हें समझ आया कि पीर को भाषा नहीं चाहिए .वह तो गूंगी होती है, पर हर अंग से बोलती रहती है।

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