
सुधांशु द्विवेदी, बांदा (उत्तर प्रदेश)
ट्रेन ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़नी शुरू कर दी है।
शहर छूट रहा है,
कुछ गलियां छूट रही हैं,
एक मोहल्ला छूट रहा है।
लेकिन कुछ लोग रह गए हैं स्टेशन पर —
उस रफ़्तार पकड़ती ट्रेन के साथ क़दमताल करते,
खिड़की की ओर देखकर हाथ हिलाते।
आंखों में बीते दिनों की यादें हैं,
एक उदास मन है,
और उस मन के साथ है — वापस लौटने का इंतज़ार।
ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है —
कितना कुछ न चाहते हुए भी छूट जाता है।
जैसे-जैसे ज़िंदगी की रफ़्तार बढ़ती है,
बहुत कुछ पीछे रह जाता है —
कभी दिल के क़रीब कोई शहर,
उस शहर की कोई ख़ास जगह,
और कुछ अपने लोग भी।
फिर भी ज़िंदगी में आगे बढ़ने के क्रम में
सहेजकर रखना होता है उन लोगों को —
जो उदास हुए बिछड़ते वक़्त,
जिनकी निगाहें मुंतज़िर रहीं अगली मुलाक़ात के लिए,
जो ठहरे रहे ज़िंदगी के उस मोड़ पर,
जहाँ सब कुछ छूटता-सा मालूम हो रहा था।
बिलकुल वैसे ही —
जैसे उस रफ़्तार पकड़ती ट्रेन के गुज़र जाने के बाद भी
ठहरे रहे कुछ लोग स्टेशन पर,
यादें, उदासी और इंतज़ार लिए।
शब्दों को और भावनाओं को अच्छे से पिरोया है आपने, सुधांशु जी