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वो कुछ लोग…

ज़िंदगी भी एक ट्रेन की तरह है — जो धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ते हुए हमें आगे ले जाती है। हर पड़ाव पर कुछ न कुछ पीछे छूट जाता है — कोई शहर, कोई गलियां, कुछ अपने लोग। लेकिन जो सच में हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके होते हैं, वे कभी पूरी तरह नहीं छूटते। वे ठहरे रहते हैं — हमारी यादों में, हमारी भावनाओं में, और उस अगली मुलाक़ात की उम्मीद में, जैसे स्टेशन पर खड़े वे लोग जो ट्रेन गुज़र जाने के बाद भी कुछ देर तक हाथ हिलाते रहते हैं… यादें, उदासी और इंतज़ार लिए।

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परत दर परत सी ज़िंदगी

मंजुला श्रीवास्तवा, प्रसिद्ध साहित्यकार, परत दर परत सी ज़िंदगी,कुछ चीन्ही, कुछ अनचीन्ही सी,कुछ अनुभूत तत्व कथ्य सी,कुछ परिधि में, कुछ परिधि से बाहर,कुछ कही, कुछ अनकही सी।परत दर परत सी ज़िंदगी,क्या कहूँ, किससे कहूँ। एक वो जो हम हो नहीं पाए,या तुमने होने नहीं दिया।एक मानचित्र जो नक्शे में है,और एक जो तलुओं और हथेलियों…

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कविता और कहानी

कभी शब्द कविता का रूप लेकर बहती है, तो कभी कहानी का रूप धरकर जीवन की झलकियाँ दिखाती है। कविता भावनाओं की नदी है — कभी आँसू की बूँदों सी, तो कभी मुस्कान की किरणों सी। हर पंक्ति में कोई सपना छुपा होता है, हर बिंब में कोई अनकहा एहसास।वहीं कहानी जीवन की लहर है — उतार-चढ़ाव से भरी हुई। पात्रों के माध्यम से समय और परिस्थितियाँ आकार लेती हैं। कभी यह तूफान की तरह सबकुछ झकझोर देती है, तो कभी सुबह की पहली रोशनी की तरह उम्मीद जगाती है।
कविता मन की भाषा है, आत्मा की धड़कन है। कहानी अनुभव की अभिव्यक्ति है, जीवन का दर्पण है। कविता विचारों का सूरज है, और कहानी अनुभूति की चाँदनी। कविता दिल को सुकून देती है, जबकि कहानी दिशा और सीख देती है।

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