वो शाम…

वो शामें कभी कितनी खूबसूरत हुआ करती थीं समंदर के किनारे आपके कंधे पर सिर टिकाकर डूबते सूरज की लालिमा को निहारना, लहरों में उसका प्रतिबिंब देख थम-सा जाना। समुद्र की जलतरंगें भी तब मानो हमारे प्यार का सुर छेड़ती थीं। आपका हाथ मेरे हाथ में होता, तो लगता था जैसे सारी दुनिया हमारे भीतर सिमट आई हो। बच्चों की मासूम आवाजें, समंदर किनारे की हलचल सब कुछ अपनी जगह था, पर हमारे बीच एक शांत-सी खुशी बहती थी।

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जज़्बातों का मेला है ज़िंदगी

ज़िंदगी कोई साधारण चीज़ नहीं, यह भावनाओं, यादों, रिश्तों और एहसासों का कुल योग है। यह क़ीमती भी है, तकलीफ़देह भी है, लेकिन हर पल हमारे बहुत पास है।

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बे-इख़्तियार मोहब्बत

मोहब्बत अजीब है…जिन्हें हमारी कद्र नहीं, हम वहीं अपनी रूह रख आते हैं।हम उनके लिए हर लम्हा ख़यालों में सुलगते रहते हैं,और वो हमारी बे-ख़ुदी की ख़बर तक नहीं लेते। शिकायत भी नहीं कर सकते…क्योंकि इश्क़ में इख़्तियार हमारा होता ही कहाँ है।

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वो कुछ लोग…

ज़िंदगी भी एक ट्रेन की तरह है — जो धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ते हुए हमें आगे ले जाती है। हर पड़ाव पर कुछ न कुछ पीछे छूट जाता है — कोई शहर, कोई गलियां, कुछ अपने लोग। लेकिन जो सच में हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके होते हैं, वे कभी पूरी तरह नहीं छूटते। वे ठहरे रहते हैं — हमारी यादों में, हमारी भावनाओं में, और उस अगली मुलाक़ात की उम्मीद में, जैसे स्टेशन पर खड़े वे लोग जो ट्रेन गुज़र जाने के बाद भी कुछ देर तक हाथ हिलाते रहते हैं… यादें, उदासी और इंतज़ार लिए।

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