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वो कुछ लोग…

ज़िंदगी भी एक ट्रेन की तरह है — जो धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ते हुए हमें आगे ले जाती है। हर पड़ाव पर कुछ न कुछ पीछे छूट जाता है — कोई शहर, कोई गलियां, कुछ अपने लोग। लेकिन जो सच में हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके होते हैं, वे कभी पूरी तरह नहीं छूटते। वे ठहरे रहते हैं — हमारी यादों में, हमारी भावनाओं में, और उस अगली मुलाक़ात की उम्मीद में, जैसे स्टेशन पर खड़े वे लोग जो ट्रेन गुज़र जाने के बाद भी कुछ देर तक हाथ हिलाते रहते हैं… यादें, उदासी और इंतज़ार लिए।

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