
डॉ. नेत्रा रावणकर, उज्जैन
मॉं : घर में जीती-जागती बस्ती का गाँव
बछड़े की गाय
लंगड़े का पाँव
बच्चे की छाँव
धरती का आंचल
गाढ़ नीला अंबर
हृदय की आवाज़
अंतरात्मा का साज
मॉं : नहीं केवल काया
अंजुलीभर माया
मंदिर का कलश
घर के आँगन की तुलसी
संत की वाणी
रेगिस्तान में प्यासे को मिलने वाला ठंडा पानी
मॉं : अनुशासन की पाठशाला
संस्कारों का दुशाला
हृदय की पुकार
आत्मा की गुहार
ईश्वर की आराधना
सफल प्रार्थना
मॉं : सिंदूर है, रोली है, चंदन है
परिवार को जोड़ने वाला बंधन है
मॉं : गगन भरारी
सारी दुनिया से न्यारी
खुश कर देती है मॉं को बच्चे की किलकारी
स्वामी तिन्ही लोक का मॉं बिना भिकारी
घर छूटता है, यादें कभी छूटती नहीं
जीवन में मॉं नाम का पन्ना कभी फटता नहीं
मॉं : जैसा नहीं कोई
मॉं : अलवार, गुलजार
क्या लिखूँ मैं मॉं के लिए?
इतने शब्द नहीं,
कहीं मॉं पर लिखते-लिखते
ख़त्म हो गई स्याही……

नमामि मातृशक्ति