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मैं कब से थी नीर की बदरी

महादेवी वर्मा जी को समर्पित सादर नमन

मैं कब से थी नीर की बदरी,
थी मैं तो माता की गुड़िया,
पिता की आँखों की पुतली।

आँगन गलियों में है गुज़री,
बचपन सखियों संग ठिठोली,
रखी सहेजी प्रीत की गठरी।

लेकर स्वप्न सुखद निगोड़ी,
बिदा ले चल पड़ी सलोनी,
बाँध अटूट रिश्तों की डोरी…!

सहज भाव मम हृदय जड़ी,
था यौवन का प्रथम मिलन,
फिर टूटी क्यों पावन जोड़ी?

कितनी रतियाँ रह गईं कोरी,
अँखियाँ श्रावण-भादो फिर भी,
बगिया सूखी रह गई मोरी।

निवेदिता श्रीवास्तव गार्गी, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर

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