ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,
ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम।

हमारे दर्द को समझे नहीं वो,
तो अपने मन को मैला क्यों करें हम।

उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,
भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम।

जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,
उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम।

मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला ली,
निभाने का दिखावा क्यों करें हम।

तुम्हीं पर जान है क़ुर्बान मेरी,
मगर हर वक़्त चर्चा क्यों करें हम।

कनक अब घर तो उनके दिल में ही है,
तो दुनिया में तमाशा क्यों करें हम।

डॉ कनक लता तिवारी, मुंबई

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