ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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सुनो ना…

वह कहती है—मत करो मुझे इतना प्यार, क्योंकि हमें पता है कि हमारा साथ अब लंबा नहीं है। फिर भी वह चाहती है कि इन कुछ पलों में वह सब समेट ले—सिंदूरी शाम, तारों से भरी चांदनी रात, भीनी-भीनी हवाएँ और उसका हाथ थामे उसकी मुस्कुराहट। उसकी चाहत बस इतनी है कि जब विदा का समय आए, तो उसकी आँखों में आंसुओं की जगह मुस्कान हो, और उसके जीवन का पिंजरे में बंधा पाखी उसी मुस्कान से मुक्त हो सके।

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