सागर

सागर की बलखाती लहरें मानो किसी प्रियजन को पुकार रही हों। हर उठती-गिरती मौज एक गीत है—कोमल, मधुर और रहस्यमय। कभी लगता है कि ये लहरें चाँद से धीमे-धीमे बातें कर रही हैं, अपने भीतर छिपे राज़ को साझा कर रही हैं। हवा भी इसमें शामिल हो जाती है, गुनगुनाहट में एक नई धुन जोड़ देती है।

रात का आकाश सितारों से झिलमिलाता है, और सागर उस रोशनी को अपने सीने में समेटकर जैसे सुबह की प्रतीक्षा करता है। सुबह का आकर्षण उसे दीवाना बना देता है—हर लहर में एक झनक, जैसे झाँझर की मधुर ध्वनि।इन लहरों में न जाने कितनी कहानियाँ बसी हैं। कुछ रंगीन सपनों की, कुछ भोली नादानियों की। मन चाहता है कि इन पलों को पलकों में बाँध लूँ, जगमगाते मोतियों की तरह सँभालकर रख लूँ।

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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