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शमा और जिंदगी

स्‍याह रात के सीने में,
चमकती शमा की लौ,
थरथराती, मगर जलती,
सपनों का आलोक ढो।

हवा का हर झोंका,
जैसे परखता हो इसे,
कभी बुझाने की कोशिश,
कभी सुलगाने की कोशिश।

ऐसी ही तो है ज़िंदगी,
हर पल संघर्ष की कड़ी,
दर्द के झोंकों में जलती,
आशाओं से सजी खड़ी।

शमा कहती, “मैं जलती हूँ,
ताकि औरों का अंधकार कटे,”
ज़िंदगी कहती, “मैं बढ़ती हूँ,
ताकि हर सपना अपने पथ चले।”

लौ का कंपकंपाना,
ज़िंदगी के डर की तरह,
पर बुझने से पहले,
सौ गुना उजाले की तरह।

शमा की ये नाज़ुक आग,
सिखाती है कुछ बात,
जले रहो, बुझो नहीं,
हर रात के बाद है प्रभात।

ज़िंदगी भी शमा की तरह,
जलते रहना है हर हाल,
कभी रोशनी, कभी संघर्ष,
यही है जीवन का कमाल।

शशि पटेल, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई

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