
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
रामायण के सात कांडों की इस विशेष श्रृंखला में आपका स्वागत है। पहले भाग में आपने बालकांड की कथा पढ़ी, जिसमें भगवान श्रीराम के जन्म से लेकर माता सीता के स्वयंवर तक की अद्भुत घटनाओं का वर्णन था। अब प्रस्तुत है इस श्रृंखला का दूसरा भाग—अयोध्या कांड। इसका अगला भाग भी शीघ्र प्रकाशित किया जाएगा, इसलिए जुड़े रहिए और रामायण के प्रत्येक अध्याय की दिव्य कथा का आनंद लीजिए।
अयोध्या कांड रामायण का वह महत्वपूर्ण भाग है, जहाँ जीवन के सबसे बड़े सत्य सामने आते हैं। यहाँ प्रेम है, त्याग है, वचन की मर्यादा है और धर्म के लिए हर सुख का बलिदान देने की प्रेरणा भी। यह कांड हमें सिखाता है कि महानता केवल शक्ति में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य और धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करने में होती है।
अयोध्या नगरी में चारों ओर उत्सव का वातावरण था। महाराज दशरथ ने निर्णय लिया कि अब श्रीराम को अयोध्या का युवराज बनाया जाए। प्रजा प्रसन्न थी, मंत्री प्रसन्न थे और पूरा नगर दीपों व मंगल सजावट से सुसज्जित हो चुका था। सभी उस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब श्रीराम के राजतिलक के साथ अयोध्या को अपना भावी राजा मिलेगा।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
महारानी कैकेयी की दासी मंथरा ने उनके मन में ईर्ष्या और भय के बीज बो दिए। उसने कैकेयी को विश्वास दिलाया कि यदि श्रीराम राजा बन गए, तो भरत का महत्व कम हो जाएगा। मंथरा की बातों में आकर कैकेयी ने वर्षों पहले महाराज दशरथ द्वारा दिए गए दो वरदान माँग लिए।
पहला वरदान यह था कि भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए और दूसरा यह कि श्रीराम चौदह वर्षों के लिए वनवास जाएँ।
यह सुनकर महाराज दशरथ स्तब्ध रह गए। उनका हृदय टूट गया, लेकिन वे अपने दिए हुए वचन से पीछे नहीं हट सकते थे। जब श्रीराम को यह बात पता चली, तो उन्होंने बिना किसी विरोध या शिकायत के वनवास स्वीकार कर लिया। उनके लिए पिता का वचन ही सर्वोच्च धर्म था।
माता सीता ने भी पतिव्रता धर्म निभाते हुए श्रीराम के साथ वन जाने का निश्चय किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जहाँ श्रीराम हैं, वहीं उनका संसार है। दूसरी ओर लक्ष्मण भी अपने बड़े भाई की सेवा के लिए वन जाने पर अडिग रहे। इस प्रकार श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण तीनों वन की ओर प्रस्थान कर गए।
जब अयोध्या की प्रजा को यह समाचार मिला, तो पूरे नगर में शोक की लहर दौड़ गई। लोग श्रीराम के रथ के पीछे-पीछे चल पड़े। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जिन श्रीराम के राजतिलक की तैयारियाँ चल रही थीं, वही अब वनवास के लिए अयोध्या छोड़ रहे हैं।
श्रीराम के वियोग में महाराज दशरथ का हृदय टूट गया। वे अपने प्रिय पुत्र के बिना जीवित नहीं रह सके और अंततः उनका देहावसान हो गया।
उधर भरत जब अपने ननिहाल से लौटे और उन्हें पूरी घटना का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने अपनी माता कैकेयी के इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया और श्रीराम को वापस अयोध्या लाने का संकल्प लिया।
अयोध्या कांड केवल वनवास की कथा नहीं है, बल्कि त्याग, कर्तव्य, वचनबद्धता और आदर्शों की सर्वोच्च मिसाल भी है। श्रीराम ने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, धर्म और मर्यादा का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
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